पढ़े लिखे लोगो का समाजवाद या ढोंग


मुझे आश्चर्य होता है जब प्रतिष्टित कहे जाने जैसे संस्थानों में पढ़े लिखे लोग बड़ी ही सावधानी से गरीब गुरबों की आवाज उठाने के नाम पर लालू यादव जैसे नेता का महिमामंडन करते है। जी हाँ ये वही लोग है जब लालू प्रसाद का बिहार की राजनीति में उदय हुआ तो इनलोगो ने कहा देखो इस व्यक्ति को कोई जानता तक नही था और आज मुख्यमंत्री है। लेकिन कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद बिहार सदन के नेता चुने गए और मुख्यमंत्री बनाये गए। अगर उस समय किसी समुदाय ने इसका विरोध किया तो यही समुदाय था कहते नही थकते थे कि इस आदमी को बोलने तक नही आता है और यह बिहार की मुख्यमंत्री बना बैठा है। इन सबके बावजूद लालू प्रसाद ने अपने अस्तितव को बचाने के लिए पिछड़े वर्ग की राजनीति शुरू की। याद रखिये यह वही दौर था जब बी पी मंडल का मंडल आयोग आया जिसका पूरे देश मे विरोध किया गया। और लालू प्रसाद के उस समय शुरू की गई पिछडो की राजनीति ने जो बिहार में पिछड़ो को आवाज दी और बिहार में एक नई राजनीतिक धुर्वीकरण का प्रादुर्भाव हुआ जिसने बिहार के साथ साथ देश के दो बड़े राज्यो में राजनीति की दिशा ही बदल दी। और यही से शुरू हुआ कहावतों का दौर जिसमे यह कहा जाने लगा कि जब तक रहेगा समोसे में आलू तबतक रहेगा बिहार में लालू। और यह कतई नही भूलना चाहिए कि बिहार में लगातार दो बड़ी विजय क्यों मिली क्योंकि बिहार के पिछड़े जिनके पास आवाज तक नही थी उनको लालू प्रसाद ने आवाज दी और राजनीति में उनके लिए दरवाजे खोल दिये। ध्यान रहे यही से शुरू हुआ लालू प्रसाद का नैतिक पतन जहाँ उन्होंने पिछड़ो की राजनीति के अलावा यादवों और मुस्लिमों की राजनीति शुरू की और दूसरी पिछड़ी जातियाँ जो उनको मसीहा समझ रहे थे, अपने आप को ठगा हुआ समझने लगे थे। यही से निरंकुशता शासन की तरफ से इस कदर बढ़ गयी जहाँ सिर्फ जाती देखकर सारे काम होने लग गए। सड़को का खस्ताहाल शुरू हो गया। शिक्षा में नैतिक पतन शुरू हुआ क्योंकि शिक्षकों को समय पर वेतन नही मिलने से वे ठगा सा महसूस करने लग गए थे। सबसे बुरा दौर तब शुरू हुआ जब मौत और अपहरण का तथाकथित उद्योग शुरू हुआ जिसने बिहार को सबसे ज्यादा बदनाम किया। और बाहर रहने वाले बिहारियों को बिहारी गाली लगना शुरू हुआ। सबसे बड़ा टैग तो पटना उच्च न्यायालय ने जंगल राज कह कर कोई कसर नही छोड़ी। पढ़े लिखे लोगो का पलायन जो तब शुरू हुआ जो बदस्तर आज भी जारी है। और उनलोगों ने तब यह कहना शुरू कर दिया था कि अब बिहार रहने लायक नही रहा और वे जब तब अपने आप को बिहारी कहने से अलग रखने लगे। यही नीतीश कुमार का प्रादुर्भाव हुआ, और जो दूसरी पिछड़ी जातियाँ लालू प्रसाद से अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे थे, नीतीश कुमार जी मे नई आशा की किरण की झलक दिखाई दी। जिसका फल यह हुआ कि नीतीश कुमार जी को नई आशा के साथ प्रदेश की बागडोर दी और पहले दो बार चुनाव जीतकर लोगो के भरोसे को कायम रखकर जिस तरह का जिन्न लगा होता था बिहारियों के सिर पर नीतीश जी ने उसको बहुत हद तक धोने का काम किया।

वाकई में लालू प्रसाद जी ने गरीब गुरबों को आवाज दी लेकिन उसकी कीमत चुकानी पड़ी बिहार को। उसकी भरपाई करने आगे आये नीतीश जी मे एक साफ स्वच्छ और सुलझे हुए नेता ने बिहार को कुछ कदम आगे ले जाने में सहायक सिद्ध हुए। लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के चलते हुए महागठबंधन ने बिहार की जनता के मन मे एक बार फिर संशय पैदा किया जिसकी वजह से नीतीश जी को पिछले चुनाव से कम सीट मिली।

जो बचपन से बाहर रहकर पढ़ लिख लिए औऱ बड़े संस्थानों में पढ़ने के बाद उनकी एक अलग विचारधारा बन जाती है जिसको पूरे संसार मे नकारा जा चुका है। और उन्हें जब अपनी जमीन खिसकती नजर आती है तो कभी कॉग्रेस के साथ कभी क्षेत्रीय पार्टियों से मिलकर अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए तथा इन पढ़े लिखे लोगो का सहारा लेकर बड़े बड़े लेख लिखकर लोगो को गुमराह किया जाता है। ये जो साल में एक आध बार गाँव चले जाते है तफरीह के लिए उन्हें क्या पता जो गरीब लालू प्रसाद के शासन के समय बिहार में रहने को मजबूर थे, उन्होंने देखी है शासन की भयावहता। अगर किन्ही को नही मालूम तो वे कृपया मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, पूर्णिया में रहने वाले लोगो से पता करे कि कैसी नारकीय जीवन व्यतीत की है। इन जिले के लोगो से व्यक्तिगत लगाव रहा है इसीलिए बेहतर तरीके से जानता हूँ। तो अगर आपको बुद्धिजीवी होने के नाते लगता है कि लालू प्रसाद जी, नीतीश कुमार जी से बड़े नेता है तो हाँ वे है क्योंकि वाकई में उनका जनाधार नही घटा लेकिन उनकी साख को जो धक्का पहुँचा है उसकी भरपाई होगी या नही आने वाला चुनाव बताएगा। मैं व्यक्तिगत तौर पर किसी का समर्थक नही रहा हूँ लेकिन नीतीश जी ने कुछ ऐसे फैसले लिए, जब बिहारी अपने अस्तित्व की लड़ाई रहे रहे थे तब एक चिराग दिखाई दिया था अंधेरे में। अगर आपको बुद्धिजीवी होने के नाते यह पता नही चारा घोटाला जो उस समय की सबसे बड़ी मानी जा रही थी। उनको भी आप हो सकता है भूल जाये तो क्या अगर कोई यह सवाल करता है कि 32 साल पहले सरकारी निवास में रहने वाला नेता हजारों करोड़ की संपत्ति का मालिक कहाँ से बन गया। तो आप इसको भी राजनैतिक साज़िश कहने में लगे हुए है। तो मुझे तो आपकी पढ़ाई पर शक होता है जो एक भ्रस्टाचारी या एक साफ सुथरी छवि के नेता में अंतर समझ नही पाता है। सनद रहे लालू प्रसाद जी को उच्चतम न्यायालय ने कोई भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया हुआ है। नीतीश कुमार जी की सहयोगियों पर भले ही कई भ्रस्टाचार के आरोप लगे हो लेकिन उनपर व्यक्तिगत तौर पर कोई भ्रस्टाचार का आरोप नही।
बेहतर है थोड़ा पढ़े लिखे होने का परिचय दे ताकि पढ़े लिखे लोग आपको सम्मान की नजर से देखे। आजकल सभी पढ़ लिख रहे है सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे है उन्हें आता है आप जैसे लोगो की प्रोफाइल चेक करना और आपके बारे में अपने मस्तिष्क में आपका चेहरा बना लेते है कि कही आप कोई छुपा हुआ एजेंडा तो थोप नही रहे है। अब वो जमाना नही रहा कि आप जो कहे अक्षरशः सही मान लेंगे वे उनकी पड़ताल करना जानते है कि कब आप ऐसे भ्रस्टाचारियों के पैर छूकर प्रणाम करते है और कब सेना को रेप करने वाला बताते है। और 40 साल की उम्र में ऐसे संस्थानों में मुफ्त की पढ़ाई करने वाले रोजगार को लेकर अचानक से सरकार के खिलाफ बोलने लग जाते है तो सवाल यह भी उठेंगे की जब लालू प्रसाद के समय बिहार में सभी तरह का ह्रास हो रहा था तो आपके मुँह से एक शब्द नही निकलता था। तो जनाब यह आज का दौर है जहाँ सबकुछ एक क्लिक पर उपलब्ध है तो थोड़ा संभल के रहिये, संभल के बोलिये, संभल के लिखिए।

जय भारत।
जय प्रजातंत्र।

Happiness Forever


                           Don’t worry, be Happy! What a refreshing thought, indeed! Celebrations everyday! Life can be so joyful if we learn to celebrate even the smallest moments and events. Celebrate when someone says you are looking great or may be because your toddler called you ma for the first time. Always remember that it is the small acts of day-to- day life that count. And more important, that happiness is not as elusive as you think.
                           This year give wings to your imagination. Do the things you have always wanted to even if it means you must go out of your way to convince friends and family that you are choosing to settle for the odd and the unconventional. Remember, it’s not about what others think of you, but what you think of yourself. If it makes you happy, it’s gotta be right. Let every single moment be a celebration. Attract happiness do not allow anything dampen your spirits, it is really a matter of how you choose to be staying happy needs the determination to seek and chase it until it surrenders itself to you. After all, happiness is a state of mind where you can be what you care without bothering about what others think of you. All you need to do is change your outlook towards life.
                           Happiness is about being content in your personal and professional relationships. The best way is to get realistic targets for yourself and try your best variables. We become vulnerable to unhappiness. Smaller expectations make you happy. Ambitions should be set keeping in mind your ability. Be flexible and lower your expectations of necessary. You must be able to choose happiness over everything else. But how do we choose happiness? More than happiness. It’s the source of happiness which is important. Also you have to be able to distinguish between happiness and pleasure. Short-term gains often lead to long term unhappiness. We have to the clear about what we won’t.
                           It’s of to you to remain happy or stay in a state of gloom. The new year is the perfect time to tell yourself that you will be happy. It happiness forgets you a letter bit, never completely forget about it.

Vivekananda Unpublished Letter 1


Two letters written by Swami Vivekananda to Maharaja Ajit Singh of Khetri were recently found among old papers in the record room of the Khetri Sub-divisional Officer’s office (Jhunjhunu District, Rajasthan, India). We are publishing the text of the letters virtually unedited.

Madras
the 15th February [1893]

Your Highness,

Two things I am telling your Highness. One—a very wonderful phenomenon I have seen in a village called Kumbakonam, and another about myself.

In the said village lives a man of the Chetty caste, generally passing for an astrologer. I, with two other young men, went to see him. He was said to tell about anything a man thinks of. So, I wanted to put him to the test. Two months ago, I dreamt that my mother was dead and I was very anxious to know about her. My second was whether what my Guru had told me was right. The third was a test-question—a part of the Buddhistic mantra, in Tibetan tongue. These questions I determined upon, two days before going to this Govinda Chetty. Another young man had one of his sisters-in-law given poison to, by some unknown hand, from which she recovered. But he wanted to know the author of that delivery.

When we first saw him, the fellow was almost ferocious. He said that some Europeans came to see [him] with the Dewan of Mysore and that since then through their ‘Dristee Dosham’ he had got fever and that he could not give us a seance then and only if we paid him 10 Rs., he would consent to tell us our ‘prasnas’. The young men with me of course were ready to pay down his fees. But he goes to his private room and immediately comes back and says to me that if I gave him some ashes to cure him of his fever he would consent to give us a seance. Of course I told him that I do not boast of any power of curing diseases but he said, ‘That does not matter, only I want [the ash]’. So, I consented and he took us to the private room and, taking a sheet of paper, wrote something upon it and gave it over to one of us and made me sign it and keep it into the pocket of one of my companions. Then he told me point blank, ‘Why you, a Sannyasi, are thinking upon your mother?’ I answered that even the great Shankaracharya would take care of his mother; and he said ‘She is all right and I have written her name in that paper in the possession of your friend’ and then went on saying, ‘Your Guru is dead. Whatever he has told you, you must believe, for he was a very very great man,’ and went on giving me a description of my Guru which was most wonderful and then he said ‘What more you want to know about your Guru?’ I told him ‘If you can give me his name I would be satisfied’, and he said, ‘Which name? A Sannyasi gets different sorts of names’. I answered, ‘The name by which he was known to the public’, and says, ‘The wonderful name, I have already written that. And you wanted to know about a mantra in Tibetan, that is also written in that paper.’ And, he then told me to think of anything in any language and tell him, I told him ‘Om Namo BhagavateVasudevaya’, and he said, ‘That is also written in the paper in possession of your friend. Now take it out and see’. And Lo! Wonder! They were all there as he said and even my mother’s name was there!! It began thus—your mother of such and such name is all right. She is very holy and good, but she is feeling your separation like death and within two years she shall die; so if you want to see her, it must be within two years.

Next it was written—your Guru Ramakrishna Paramahamsa is dead but he lives in Sukshma, i.e., ethereal body, and is watching over you, etc. and then it was written ‘Lamala capsechua’, in Tibetan, and then at last was written ‘In conformation to what I have written, I give you also this mantra which you would give me after one hour after my writing; ‘Om Namo Bhagavate etc.’; and so he was equally successful with my friends. Then I saw people coming from distant villages and as soon as he sees them he says—‘Your name is such and such and you come from such and such village for this purpose’. By the time he was reading me, he toned down very much and said—‘I won’t take money from you. On the other hand, you must take some “seva” from me’. And I took some milk at his house and he brought over his whole family to bow down to me and I touched some ‘vibhutee’ brought by him and then I asked him the source of his wonderful powers. First he would not say, but after a while he came to me [and] said—‘Maharaj, it is “siddhi of mantras” through the “sahaya” of “Devi”.’ Verily, there are more things on heaven and earth Horatio than your philosophy ever dreamt of—Shakespeare.

The second is regarding me. Here is a zamindar of Ramnath, now staying in Madras. He is going to send me over to Europe and, as you are already aware of, I have a great mind to see those places. So I have determined to take this opportunity of making a tour in Europe and America. But I can’t do anything without asking your Highness, the only friend on Earth I have.

So kindly give your opinion about it. I only want to make a short tour in those places. One thing I am certain of, that I am [an] instrument in the hands [of] a holy and superior power. Myself, I have no peace, am burning literally day and night, but somehow or other, wherever I go hundreds and, in some [places] as in Madras, thousands would come to me day and night and would be cured of their skepticism and unbelief but I—! I am always unhappy!! Thy will be done!! Therefore, I don’t know what this power requires of me, to be done in Europe. I cannot but obey. ‘Thy will be done’!! There is no escape.

I congratulate your Highness on the birth of a son and heir. May the infant prince be quiet like his most noble father and may the Lord shower his blessings always on him and his parents.

So I am going over in two or three weeks to Europe. I can’t say anything as to the future of the body. Only I pray to your Highness if it be proper to take some care of my mother that she does not starve.

I would be highly obliged to get a reply soon, and pray your Highness to keep the latter part of this letter, i.e., my going over to England etc., confidential.

May you be blessed all your life, you and yours, is the prayer that is day and night offered up by,

Vivekananda
C/o. M.Bhattacharya Esq.
Assistant Accountant General
Mt. St. Thome, Madras

www.shashionline.in 

Positive approach…


Living on Earth is expensive,
but it does include a free trip
around the sun every year.

Birthdays are good for you;
the more you have,
the longer you live.

Happiness comes through doors you
didn’t even know you left open.

Ever notice that the people who are late
are often much jollier
than the people who have to wait for them?

How long a minute is
depends on what side of the
bathroom door you’re on .

Most of us go to our grave
with our music still inside of us.
If Wal-Mart is lowering prices every day,
how come nothing is free yet?

You may be only one person in the world,
but you may also be the world to one person.

mistakes are too much fun
to only make once.
Don’t cry because it’s over;
smile because it happened.

We could learn a lot from crayons:
some are sharp, some are pretty,
some are dull, some have weird names,
and all are different colors….but
they all exist very nicely in the same box.

A truly happy person is one who
can enjoy the scenery on a detour.

Have an awesome day, and
know that someone
who thinks you’re great
has thought about you today!

“And that person was me.”

Working for God on earth does not pay much,
but His Retirement plan is out of this world.

For more info: www.shashionline.in

Some beautiful tips…



1. God is real, unless declared integer.

2. Before borrowing money from a friend, decide whether you need more.

3. Death is hereditary.

4. There are three sides to every argument: your side, my side and the right side.

5. An expert is someone who takes a subject you understand and makes it sound confusing.

6. Many things can be preserved in alcohol. Dignity is not one of them.

7. Never argue with a fool. People might not know the difference.

8. When you’re right, no one remembers. When you’re wrong, no one forgets.

9. Cheer up, the worst is yet to come .

10. Always remember that you are absolutely unique. Just like everyone else.

11. Well done is better than well said .

12. Everyone makes mistakes. The trick is to make them when nobody is looking.

13. Always borrow money from a pessimist. He won’t expect it back.

14. If you can’t see the bright side of life, polish the dull side.

15. Where there’s a will there are five hundred relatives.

16. Everybody wants to go to heaven, but nobody wants to die.

www.shashionline.in