​देशभक्ति या कुछ और…


देशभक्ति एक ऐसा शब्द है आज की तारीख में आपने अगर बोल दिया तो आप भक्त कहलायेंगे ना की देशभक्त।
 तो देशभक्त के मायने क्या है क्या उसको किसी दायरे में बाँधा जा सकता है। शायद नहीं क्योंकि देशभक्ति कोई चीज नहीं जिसको किसी राजनितिक पार्टी की दूकान से ख़रीदा जा सके, लेकिन ऐसा भी नहीं जिसे किसी स्कूल या कॉलेज में पढ़ाया जा सके। तो आखिर इसका पैमाना क्या हो कैसे पता चले की कौन देशभक्त है कौन नहीं। 

देशभक्ति एक ऐसा जज्बा है जो आपके सामने झंडे के आते ही आपके अंदर से आवाज़ निकलनी चाहिये ना की किसी के कहने पर। देशभक्ति ऐसा जज्बा है जो राष्ट्रगान बजते ही आपके अंदर से आवाज़ आनी चाहिये ना की किसी के कहने पर। देशभक्ति ऐसा जज्बा है जब देश के ऊपर किसी बाहरी शक्तियों द्वारा हमला करने या हमला होने की स्थिति में अंदर से आवाज़ निकलनी चाहिए। देशभक्ति एक ऐसा जज्बा है जो सैनिको के कुछ अच्छे काम करने को लेकर आपके अंदर पैदा उत्साह को देशभक्ति के साथ जोड़कर देख सकते है। तबतक जबतक आप ऐसे किसी भी सैनिक कार्यवाही को बिना किसी लेकिन किन्तु परंतु के बिना इसको राष्ट्र के साथ जोड़कर देखते है। जैसे ही आप इसको किन्तु परंतु के साथ जोड़ते है फिर आपको खुद सोचना पड़ेगा की आप क्या चाहते है। सीमा पर सैनिक है तभी आप सुरक्षित है यह ध्यान रखना आवश्यक है। ऐसा नहीं है अगर आपके अंदर कोई ऐसा है जो आपको अंदर से कमजोर कर रहा है कोशिश कर रहा जो किसी भी तरह से सामाजिक ताना- बाना को क्षति पहुंचाने की कोशिश करता है तब आप अगर उसमें किन्तु परंतु लगाते है तो वह फिर सोचने के काबिल है। 

कहने का मतलब साफ है की ऐसा कोई भी काम जो समाजहित में या देशहित में है या उस फैसले से समाज पर असर पड़ने वाला है या समाज की भलाई होने वाली है उसके ऊपर ऊँगली उठाना एक तरह से आपको अपने ऊपर सोचने की जरुरत है। किसी एक व्यक्ति का विरोध करने के लिए सिर्फ किसी भी काम का विरोध करना देशहित के फैसलों पर कतई सही नहीं है।

इंसानियत, जम्हूरियत, कश्मीरियत और श्रीनगर


तीन तावीज़ लेकर श्रीनगर पहुंचे माननीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह जी १) इंसानियत २) जम्हूरियत ३) कश्मीरियत। क्या इन तीन ताबिजो से श्रीनगर में छा गए भूतों से निज़ात मिल पायेगा? क्या कश्मीरियत का वाक़ई में भला होगा या सिर्फ श्रीनगर शहर में रहने वालों का भला होगा?

क्योंकि कश्मीर के अंदर गाँवों में रहने वाले तो आज तक वैसे ही जी रहे है जैसे ५० साल पहले जी रहे थे।

क्योंकि लद्दाख में रहने वालों की ज़िन्दगी में अमूमन कोई बदलाव नहीं आया पिछले ५० सालों में।

क्योंकि जम्मू के ग्रामीण इलाके में अभी तक वही हालात है जो ५० साल पहले थे।

क्योंकि कश्मीरी पंडितों ने ९० के दशक में अपना घर बार छोड़ा तो कही ना कही डर का माहौल भी एक वजह थी जो आजतक वजूद में है।

तो सवाल उठता है आखिर पिछले २५ सालों की सरकारों ने क्या किया है। क्या सरकारो ने अपनी सिर्फ सरकारे चलाई है उन फिरकापरस्त लोगो के साथ मिलकर तभी ऐसा कोई वाक्या नहीं हुआ? क्या किसी को पता है कश्मीर इससे लंबी कर्फ्यू को भी झेल चुका है जो तकरीबन ९० दिन की थी? क्या पिछली सरकारों ने कुछ और कमाल किया हुआ था जिसकी वजह से ऐसा कुछ नहीं हो रहा था? क्या वाक़ई में बीजेपी और पीडीपी की सरकार में आपस में तालमेल की कमी की वजह से ऐसा हो रहा है? या वाक़ई में बीजेपी कुछ और खेल रही है?

लेकिन हमारे तथाकथित बड़े पत्रकारों की रिपोर्टिंग से कुछ और समझ आ रहा है। वे या तो बरगला रहे है लोगो को, नहीं तो सही रिपोर्टिंग कर रहे है। लेकिन ऐसे बड़े कई पत्रकारो की झूठी रिपोर्टिंग भी पकड़ी गयी है जो किसी दूसरे देश की इमेज को कश्मीर की बताकर रिपोर्टिंग करते पकड़े गए है और सार्वजानिक तौर पर मांफी भी मांग चुके है।

तो आखिर ऐसा क्या हो रहा है जो यह थमने का नाम नहीं ले रही है? क्या हमारे राजनितिक नेतृत्व को यह पसंद नहीं की वहां अमन चैन लौट आये? क्या वहां की कुछ स्थानीय पार्टियां कुछ खेल खेल रही है? छोटी छोटी घटनाओं पर अपने अपने फायदे के हिसाब से घटनास्थल का दौरा करने वाली पार्टियों के नेता भी श्रीनगर क्यों नहीं जाते है लोगो को समझाने की आप जो कर रहे है वह जम्हूरियत का रास्ता नहीं है। वह कश्मीरियत का रास्ता भी नहीं है और इंसानियत का तो कतई नहीं है।

कही ना कही ऐसा लगता है जैसे हमें सोचना है कि हमें क्या करना चाहिए ऐसे हालातों में।

असली स्वतंत्रता या नकली स्वतंत्रता


Happy Independence Day
Happy Independence Day

आज 15 अगस्त को हर कोई सोशल मीडिया पर अपनी अपनी देशभक्ति प्रदर्शित करने में लगा हुआ है अपने अपने तरीके से। हर किसी के प्रोफाइल को देखकर ऐसा लगता है जैसे अगर आज अँगरेज़ होते तो सोशल मीडिया के वीर उन्हें कुछ ही मिनटों में निकाल बाहर फेंकते।

क्या वाक़ई में यही स्वतंत्रता है?

हमे वाक़ई में स्वतंत्रता चाहिए तो हमें अपने अंदर कुछ बदलावों को तवज्जो देनी चाहिए ताकि हम बदल सके और अपने समाज के अंदर बदलाव ला सके और मेरे ख्याल से वाक़ई में वही स्वतंत्रता होगी। तो अब सवाल उठता है ऐसे कौन से बदलाव लाये जाये अपने अंदर ताकि हमें सच्ची स्वतंत्रता मिल सके।

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दोहरे मापदंड का शिकार कौन?


अगर आप यह कहते है की JNU में जो हुआ वह बोलने की आज़ादी थी तो NIT श्रीनगर में जो हुआ वह क्या था देश द्रोह, कहाँ गए वे बुद्धिजीवी जो एक लाल सलाम का नाटक करने वाला जिसकी पीएचडी का मुख्य विषय ही अफ्रीकन पढ़ाई पर शोध करना हो और वह अफ्रीका के किसी देश में ना जाकर यही देश के अंदर नारा लगाने वाले को अभिव्यक्ति की आज़ादी खतरे में नहीं दिखती। कहाँ गए वे बुद्धिजीवी जो हिन्दुओ को गाली देना धरनिर्पेक्षतावाद समझते है। कहाँ गए वे बड़े बड़े बुद्धिजीवी जो टीवी स्क्रीन को काला करके अपने मन की भड़ास निकालते है। कहाँ गए वे जो स्टूडियो में बैठकर दूसरे पर चिल्लाकर अपनी बात कहलवाना चाहते है। कहाँ गए वे लोग जो देशभक्ति के नाम पर झंडा लेकर दुसरो की पिटाई कर रहे थे। आज भी किन्ही बुद्धिजीवी को एक कौम एक राज्य में खतरे में नहीं नज़र आती है। क्योंकि यही वह कौम है जो 90 के दशक में अपने घरो से खदेड़कर उन्हें अपने ही देश नहीं अपने ही राज्य में निर्वाषित जीवन जीने पर मजबूर किया गया। लेकिन एक व्यक्ति जो 10 व्यक्तियों की ग़लतियो की सजा भुगतता है तो इन बुद्धिजीवियों को उस व्यक्ति की कौम खतरे में नज़र आने लगती है।

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अभिव्यक्ति की आज़ादी या देशभक्ति या कुछ और


कुछ लोग कहते है की अगर आपने एक पार्टी के विरोध में कुछ बोला नहीं की आप देशद्रोही हो गए और दूसरी तरफ दूसरे लोग यही बात कहते है अगर आपने एक पार्टी के विरोध में बोला नहीं की आपको भक्त करार दिया जायेगा। जैसे अगर किसी ने आज की तारीख में यह बोल दिया की JNU में देशद्रोही नारे लगे तो बीजेपी वाले लोगो की नज़र में आप देशभक्त होते है या नहीं लेकिन दूसरी तरफ वाले आपको मोदी भक्त या आरएसएस का एजेंट या कट्टर हिंदूवादी या भक्त जरूर कहते नज़र आ जाएंगे। अब इसी का दूसरा पहलु देखते है अगर किसी ने यह कह दिया JNU में जो नारे लगे वह देशद्रोही तो है लेकिन….? तो आपको जो कल तक मोदी भक्त कहते हुए नज़र आ रहे थे आज आपको देश का सच्चा देशभक्त कहता हुआ नज़र आएगा और दूसरी तरफ वाला आपको देशद्रोही, पाकिस्तानी समर्थक, वामपंथी कहता हुआ नज़र आएगा। आखिर आम आदमी जाये तो जाये कहाँ। इसी वजह से बहुत सारे लोग खुल के यह बात कह नहीं पाते है उनके मन में क्या है। तो यही वजह है की कुछ लोग इन झमेलों से अपने आप को दूर रखने की यथासंभव कोशिश कर रहे है।

सबसे ज्यादा तो तरस आता है पढ़े लिखे नौजवानो पर जो की जीवन में किसी ना किसी तरह एक खास राजनितिक आइडियोलॉजी को सपोर्ट करते है, और किसी राजनैतिक आइडियोलॉजी का समर्थन करना गलत नहीं है।

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