समाज में होने वाले दुष्कृत्य का जिम्मेदार कौन?


बिहार में एक तेरह साल की बच्ची के साथ कुछ अल्पवयस्क लड़कों ने सड़क पर जो घिनौना दृश्य प्रस्तुत किया वह कही से भी एक सभ्य समाज के लिए सही नहीं कहा जा सकता है तो इसका क्या मतलब हम समाज को भेड़ियो का समाज या सांपो का समाज या जानवरों का समाज कहना शुरू कर दे। शायद नहीं क्योंकि अगर किसी समाज में एक मुठ्ठी भर ऐसे असामाजिक दुस्चरित्र वाले लोग रहते हो तो समाज को सोचना पड़ेगा। क्या ऐसी छेड़छाड़ की घटनाए सिर्फ लड़कियों के साथ होती है शायद नहीं क्योंकि एक रिपोर्ट के अनुसार जितनी संख्या में लड़कियां ऐसी घटनाओ की शिकार होती है उससे कही ज्यादा अल्पवयस्क बच्चे ऐसी यौनउत्पीडन के शिकार होते है इसी वजह से सरकार ने POCSO Act 2012 में बदलाव किया है जिसमे यौन उत्पीड़न के मामलो में अब लड़कियों के साथ लडको को भी शामिल किया है।

इस विडियो में सारे लड़के जो इस घटना में शामिल है ऐसा लगता है सभी अल्पवयस्क है इसको शत प्रतिशत दावे के साथ तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन कुछ तो है ही तो आप सोचिये की समाज में मानसिकता किस हद तक नीचे जा चुकी है। ऐसी घटना जो दिन दहाड़े एक रोड पर ऐसी घटना का होना यह दर्शाता है समाज की इस नैतिक ह्रास के कही ना कही हम भी जिम्मेदार है। हिम्मत देखिये एक अल्पव्यस्क मोबाइल से शूट कर रहा है, जो कि बाद में सोशल मीडिया पर डाल दिया गया। ऐसा लगता है घटना के वक्त कुछ लोग आसा पास में है लेकिन किसी ने भी उस लड़की को बचाने की कोई कोशिश नहीं की वह लड़की खुद ही लड़ती रही, लड़के हँसते रहे, और उसके कपड़े फाड़ते रहे। ये किस तरह की दरिंदगी है जहाँ हम उस लड़की को बचा नहीं पाते है जिसकी वजह से हम मर्दों का अस्तित्व है अगर हमारी बहन, माता बेटी ना हो तो हमारा कोई अस्तित्व नहीं है यह हम सबको समझना होगा।

मैं पहले भी कहता रहा हूँ अगर हम ऐसी घटनाओं को रोकने में असफल हो रहे है तो कही ना कही सामाजिक तौर पर ऐसे समाज के साथ साथ उसमें रहने वाले ऐसे लडको से ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं। आप ऐसी घटनाओं के लिए हमेश सरकार को नहीं जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते है क्योंकि इसमें पुलिस या प्रशासन तो तब हरकत में आएगी जब अपराध का संज्ञान उस तक पहुंचेगा, लेकिन सरकार की जिम्मेदारी है की जब भी ऐसे केस उनके सामने आये वे पूरी संवेदनशीलता के साथ इसको अपने परिवार में हादसा समझकर इसको अंत तक ले जाए जिससे आगे ऐसा करने वाले के ऊपर पुलिस या प्रशासन का भय पैदा हो।

ऐसी घटनाओं का ऐसे समय पर होना जब माहौल इन मुद्दों को लेकर गर्म है और हर आदमी कठुआ, उन्नाव और ग़ाज़ियाबाद की बातें कर रहा है? क्या सच में अपराधियों का मन बढ़ गया है या फिर समाज उदासीन हो गया गया है? हालाँकि पुलिस ने एक्शन लेते हुए कुछ अपराधियों को गिरफ़्तार कर लिया है, लेकिन कठुआ के संदर्भ में जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री का यह बयान आना कि कठुआ जैसी घटना एक छोटी सी घटना है, जिसे तूल नहीं देना चाहिए। लेकिन कोई भी ऐसी घटना क्या इतनी छोटी होगी जब ऐसे ताकतवर नेताओ के परिवारों के साथ घटित होगी। चाहे घटनाएं किसी के साथ भी हो ऐसा घटनाएं समाज के माथे पर कलंक की तरह है जो किसी भी सभ्य व्यक्ति को नागवार गुजरेगी।

चाहे ऐसी घटनाएं किसी लड़की के साथ भी हो हम सबको आगे आकर हर ऐसी घटना की निंदा करनी होगी और अपने सामाजिक परिवेश में रह रहे अगली पीढ़ी को संवेदनशील बनाना पड़ेगा ताकि वे कीसी की भी बहन, बेटी और माँ की इज्जत करना सीखे ना की सिर्फ अपनी बहन, बेटी या माँ की। दिन दहाड़े सड़क पर एस घटनाओं के जिम्मेदार हम खुद ही है कही ना कही तो आइये हम सब मिलकर ऐसी किसी भी घटना की जिम्मेदारी लेकर समाज को उत्कृष्ट बनाने की कोशिश में अपना अपन योगदान दे ताकि हमारी आगे वाली पीढ़ी एक स्वस्थ, सुन्दर और सुरक्षित समाज में सांस ले सके।

#JusiceForAll #JusiceForAllGirl #BoycottRapist

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सोशल मिडिया पर डेटा चोरी


लोग डेटा चोरी का आरोप प्रत्यारोप वाला खेल में मग्न है लेकिन जब आप 10 रुपैया कैशबैक के चक्कर मे अपना फ़ोन नंबर, ईमेल आईडी या अपना लोकेशन शेयर करते है तब शायद आप यह नही सोचते है। लेकिन चूँकि राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी ने एक दूसरे के प्रति यह बात उठाई है तो कही ना कही हम भारतीय पैदायशी राजनैतिक गुरु होने के नाते हम भी इस छींटाकशी में सम्मिलित हो जाते है।

क्या आप आज की तारीख में अगर आप स्मार्टफोन उपभोक्ता है तो सोच सकते है किसी भी एप्प को मैं अपना मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी या अपनी लोकेशन नही दूँगा तो बेहतर है आप बेसिक मोबाइल ही उपयोग कर लीजिए। क्योंकि स्मार्टफोन का मतलब साफ है आप कही ना कही आप किसी ना किसी एप्प को अपनी व्यक्तिगत जानकारी दे ही रहे है चाहे ना चाहते हुए ही सही लेकिन आप दे तो रहे है उन्हें अपने डेटाबेस में संग्रह करने के लिए फिर क्यों इतना हाय तौबा क्या इसीलिए क्योंकि आपकी अपनी राजनैतिक पार्टी आप जिसका समर्थन करते है उन्होंने अपनी विपक्षी पार्टी पर आरोप लगाया है।

आप यही उस भ्रमजाल में फंस रहे है जिसका नाम शार्क है आप कही भी जाएंगे एक शार्क से बचेंगे लेकिन दूसरी शार्क आपको निगलने के लिए तैयार बैठी है। तो आप यह मान के चलिये की आपका निगला जाना तय है तो आप किस शार्क के द्वारा निगल जाना पसंद करेंगे यह आपकी इच्छा पर निर्भर है।

आपको दुनिया मे कोई भी चीज मुफ्त में उपलब्ध नही है तो आप सोचिये की जिसका आप अपने हाथ मे रखे स्मार्टफोन से इतना ज्यादा इस्तेमाल करते है तो एक सॉफ्टवेयर अभियंता से पता कीजिये उसका मूल्य क्या हो सकता है जिसका आप बिना किसी मूल्य के उपयोग कर रहे है तो आपको खुद बखुद अंदाजा हो जाएगा कि आपको मुफ्त में क्यों मिल रहा है। अगर इतनी महंगी चीज आपको मुफ्त में मिल रही है तो सोचना आपको होगा कही आप खुद तो पैसे बना के तो नही दे रहे है। जी आप खुद उसके ग्राहक है जिसको वह पैसे के लिए कभी भी कुछ भी परोस रहा है।

जितनी मेरी अनुभव कहती है उसके हिसाब फेसबुक या कोई भी ऐसी जगह जो आपको मुफ्त में इतनी सारी सूचनाएं प्रदान करता है कही ना कही आपकी गोपनीयता को गोपनीय तरीके से किसी ना किसी प्रकार किसी और को गोपनीय तरीके से परोस रहा है।

तो सिर्फ सुरक्षा संबंधी बातो का ध्यान ना रखे अपने प्रोफाइल से हो रही गतिविधियों के प्रति सजग रहे। क्योंकि 99℅ भारतीय जो सोशल मीडिया उपयोग करते है उनको यह पता तक नही होता है कि क्या हो रहा है कैसे हो रहा है। और कई बार ऐसी बाते साझा करते है जिनके बारे में बाद में पछताते है। जिससे आपकी पसंद, नापसंद, खाना, पीना, अच्छा,खराब, आप कहाँ कहाँ जाते है सबकी जानकारी साझा करते है जिससे एक आम इंसान भी आपके प्रोफाइल को देखकर आपके बारे में 80% बाते बता सकता है।

सजग रहिये सतर्क रहिये।
जय हिंद जय भारत।

पढ़े लिखे लोगो का समाजवाद या ढोंग


मुझे आश्चर्य होता है जब #प्रतिष्टित कहे जाने जैसे संस्थानों में पढ़े लिखे लोग बड़ी ही सावधानी से गरीब गुरबों की आवाज उठाने के नाम पर लालू यादव जैसे नेता का महिमामंडन करते है। जी हाँ ये वही लोग है जब लालू प्रसाद का बिहार की राजनीति में उदय हुआ तो इनलोगो ने कहा देखो इस व्यक्ति को कोई जानता तक नही था और आज मुख्यमंत्री है। लेकिन कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद बिहार सदन के नेता चुने गए और मुख्यमंत्री बनाये गए। अगर उस समय किसी समुदाय ने इसका विरोध किया तो यही समुदाय था कहते नही थकते थे कि इस आदमी को बोलने तक नही आता है और यह बिहार की मुख्यमंत्री बना बैठा है। इन सबके बावजूद लालू प्रसाद ने अपने अस्तितव को बचाने के लिए पिछड़े वर्ग की राजनीति शुरू की। याद रखिये यह वही दौर था जब बी पी मंडल का मंडल आयोग आया जिसका पूरे देश मे विरोध किया गया। और लालू प्रसाद के उस समय शुरू की गई पिछडो की राजनीति ने जो बिहार में पिछड़ो को आवाज दी और बिहार में एक नई राजनीतिक धुर्वीकरण का प्रादुर्भाव हुआ जिसने बिहार के साथ साथ देश के दो बड़े राज्यो में राजनीति की दिशा ही बदल दी। और यही से शुरू हुआ कहावतों का दौर जिसमे यह कहा जाने लगा कि जब तक रहेगा समोसे में आलू तबतक रहेगा बिहार में लालू। और यह कतई नही भूलना चाहिए कि बिहार में लगातार दो बड़ी विजय क्यों मिली क्योंकि बिहार के पिछड़े जिनके पास आवाज तक नही थी उनको लालू प्रसाद ने आवाज दी और राजनीति में उनके लिए दरवाजे खोल दिये। ध्यान रहे यही से शुरू हुआ लालू प्रसाद का नैतिक पतन जहाँ उन्होंने पिछड़ो की राजनीति के अलावा यादवों और मुस्लिमों की राजनीति शुरू की और दूसरी पिछड़ी जातियाँ जो उनको मसीहा समझ रहे थे, अपने आप को ठगा हुआ समझने लगे थे। यही से निरंकुशता शासन की तरफ से इस कदर बढ़ गयी जहाँ सिर्फ जाती देखकर सारे काम होने लग गए। सड़को का खस्ताहाल शुरू हो गया। शिक्षा में नैतिक पतन शुरू हुआ क्योंकि शिक्षकों को समय पर वेतन नही मिलने से वे ठगा सा महसूस करने लग गए थे। सबसे बुरा दौर तब शुरू हुआ जब मौत और अपहरण का तथाकथित उद्योग शुरू हुआ जिसने बिहार को सबसे ज्यादा बदनाम किया। और बाहर रहने वाले बिहारियों को बिहारी गाली लगना शुरू हुआ। सबसे बड़ा टैग तो पटना उच्च न्यायालय ने जंगल राज कह कर कोई कसर नही छोड़ी। पढ़े लिखे लोगो का पलायन जो तब शुरू हुआ जो बदस्तर आज भी जारी है। और उनलोगों ने तब यह कहना शुरू कर दिया था कि अब बिहार रहने लायक नही रहा और वे जब तब अपने आप को बिहारी कहने से अलग रखने लगे। यही नीतीश कुमार का प्रादुर्भाव हुआ, और जो दूसरी पिछड़ी जातियाँ लालू प्रसाद से अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे थे, नीतीश कुमार जी मे नई आशा की किरण की झलक दिखाई दी। जिसका फल यह हुआ कि नीतीश कुमार जी को नई आशा के साथ प्रदेश की बागडोर दी और पहले दो बार चुनाव जीतकर लोगो के भरोसे को कायम रखकर जिस तरह का जिन्न लगा होता था बिहारियों के सिर पर नीतीश जी ने उसको बहुत हद तक धोने का काम किया।

वाकई में लालू प्रसाद जी ने गरीब गुरबों को आवाज दी लेकिन उसकी कीमत चुकानी पड़ी बिहार को। उसकी भरपाई करने आगे आये नीतीश जी मे एक साफ स्वच्छ और सुलझे हुए नेता ने बिहार को कुछ कदम आगे ले जाने में सहायक सिद्ध हुए। लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के चलते हुए महागठबंधन ने बिहार की जनता के मन मे एक बार फिर संशय पैदा किया जिसकी वजह से नीतीश जी को पिछले चुनाव से कम सीट मिली।

जो बचपन से बाहर रहकर पढ़ लिख लिए औऱ बड़े संस्थानों में पढ़ने के बाद उनकी एक अलग विचारधारा बन जाती है जिसको पूरे संसार मे नकारा जा चुका है। और उन्हें जब अपनी जमीन खिसकती नजर आती है तो कभी कॉग्रेस के साथ कभी क्षेत्रीय पार्टियों से मिलकर अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए तथा इन पढ़े लिखे लोगो का सहारा लेकर बड़े बड़े लेख लिखकर लोगो को गुमराह किया जाता है। ये जो साल में एक आध बार गाँव चले जाते है तफरीह के लिए उन्हें क्या पता जो गरीब लालू प्रसाद के शासन के समय बिहार में रहने को मजबूर थे, उन्होंने देखी है शासन की भयावहता। अगर किन्ही को नही मालूम तो वे कृपया मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, पूर्णिया में रहने वाले लोगो से पता करे कि कैसी नारकीय जीवन व्यतीत की है। इन जिले के लोगो से व्यक्तिगत लगाव रहा है इसीलिए बेहतर तरीके से जानता हूँ। तो अगर आपको बुद्धिजीवी होने के नाते लगता है कि लालू प्रसाद जी, नीतीश कुमार जी से बड़े नेता है तो हाँ वे है क्योंकि वाकई में उनका जनाधार नही घटा लेकिन उनकी साख को जो धक्का पहुँचा है उसकी भरपाई होगी या नही आने वाला चुनाव बताएगा। मैं व्यक्तिगत तौर पर किसी का समर्थक नही रहा हूँ लेकिन नीतीश जी ने कुछ ऐसे फैसले लिए, जब बिहारी अपने अस्तित्व की लड़ाई रहे रहे थे तब एक चिराग दिखाई दिया था अंधेरे में। अगर आपको बुद्धिजीवी होने के नाते यह पता नही चारा घोटाला जो उस समय की सबसे बड़ी मानी जा रही थी। उनको भी आप हो सकता है भूल जाये तो क्या अगर कोई यह सवाल करता है कि 32 साल पहले सरकारी निवास में रहने वाला नेता हजारों करोड़ की संपत्ति का मालिक कहाँ से बन गया। तो आप इसको भी राजनैतिक साज़िश कहने में लगे हुए है। तो मुझे तो आपकी पढ़ाई पर शक होता है जो एक भ्रस्टाचारी या एक साफ सुथरी छवि के नेता में अंतर समझ नही पाता है। सनद रहे लालू प्रसाद जी को उच्चतम न्यायालय ने कोई भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया हुआ है। नीतीश कुमार जी की सहयोगियों पर भले ही कई भ्रस्टाचार के आरोप लगे हो लेकिन उनपर व्यक्तिगत तौर पर कोई भ्रस्टाचार का आरोप नही।
बेहतर है थोड़ा पढ़े लिखे होने का परिचय दे ताकि पढ़े लिखे लोग आपको सम्मान की नजर से देखे। आजकल सभी पढ़ लिख रहे है सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे है उन्हें आता है आप जैसे लोगो की प्रोफाइल चेक करना और आपके बारे में अपने मस्तिष्क में आपका चेहरा बना लेते है कि कही आप कोई छुपा हुआ एजेंडा तो थोप नही रहे है। अब वो जमाना नही रहा कि आप जो कहे अक्षरशः सही मान लेंगे वे उनकी पड़ताल करना जानते है कि कब आप ऐसे भ्रस्टाचारियों के पैर छूकर प्रणाम करते है और कब सेना को रेप करने वाला बताते है। और 40 साल की उम्र में ऐसे संस्थानों में मुफ्त की पढ़ाई करने वाले रोजगार को लेकर अचानक से सरकार के खिलाफ बोलने लग जाते है तो सवाल यह भी उठेंगे की जब लालू प्रसाद के समय बिहार में सभी तरह का ह्रास हो रहा था तो आपके मुँह से एक शब्द नही निकलता था। तो जनाब यह आज का दौर है जहाँ सबकुछ एक क्लिक पर उपलब्ध है तो थोड़ा संभल के रहिये, संभल के बोलिये, संभल के लिखिए।

जय भारत।
जय प्रजातंत्र।

​सुकमा में हुए नक्सली घटना में शहीद हुए हमारे सैनिको को श्रद्धांजलि। 


सुकमा में हुए नक्सली घटना में शहीद हुए हमारे सैनिको को श्रद्धांजलि। 

ऐसा लगता यह सरकार सिर्फ कड़ी निंदा के लिए जानी जाएगी और वह किसी भी तरह की निंदा की बात की करेगी जैसे कठोर निंदा, घोर निंदा या कड़ी निंदा। पहले भी ऐसा होता रहा है। पहले की सरकारें भी ऐसी ही कड़ी निंदा करती रही है। अगर सरकार चाहे तो कुछ भी हो सकता है, क्योंकि नक्सली बहुल इलाकों में केंद्र और राज्य सरकारें अगर तालमेल बिठाकर चले तो ऐसी घटनाएं कभी हो ही नहीं। लेकिन ऐसा लगता है राज्य सरकारों की भी अपनी मजबूरियाँ है जिसके चलते वे भी कोई कड़ा कदम नही उठाते है और किसी को ठेस ना पहुंचे उसके बाद यह कहना चाहूँगा की वे ऐसा चाहते है कि होते रहे और उनकी दुकानें चलती रहे। सरकारें आती जाती है लेकिन ऐसा लगता है की सरकारी कुर्सी में ही कुछ ऐसा है जिससे वहाँ पर बैठने वालों का चरित्र वैसा ही हो जाता है जैसा एक निवर्तमान मुख्यमंत्री जी ने कहा था कि इस कुर्सी में ही कुछ ऐसा है जिसपर बैठते ही लोग एक ही तरीके से व्यवहार करने लग जाते है।

सही कहा था किसी ने, सरकारें आती जाती रहेंगी लेकिन यह मुल्क मेरे बाद भी रहेगा और मेरे कई पुस्तों के बाद भी रहना चाहिए। आइए सब मिलकर आवाज उठाएं की अब सरकारों को आम जनता की भावनाओं से खिलवाड़ ना करके उनकी भावनाओं के साथ न्याय करना चाहिए। हम गूंगी बहरी सरकार को जगा सकते है। हमे अपनी आवाज उन तक पहुंचानी है ताकि सरकारी तंत्र में बैठे लोग यह समझे कि हमारी भावनाएं क्या है और हम क्या चाहते है। हम एक एक कर मारे जा रहे है और हम इंतज़ार कर रहे ही कि कोई ऐसी घटना हो जिससे सारा संसार हमारी काबिलियत पर उंगली उठाने लग जाये। 

उठो जागो और बता दो हम क्या चाहते है और ऐसे हैवानियत के पुजारियों को जो खाद पानी शहरों में बैठकर दे रहे है उन्हें भी हमारी आवाज सुननी होगी कि वे सिर्फ एकतरफ़ा बाते नही कर सकते है। वे सिर्फ यहां पर एसी कमरों में बैठकर गरीबों के हितों की बात ना करे। हमने गरीबी देखी है और अगर वाकई में देखनी है तो चले हमारे साथ हम दिखाएंगे की गरीबी क्या होती है। फिर देखते है किस तरह के गरीबों के हितों की बात करते है। ब्रांडेड कुर्ता, जीन्स और चप्पलें पहनने वाले गरीबो के हितों की बात करते है। खोखली मानसिकता के पुजारी ये सिर्फ हल्ला कर सकते है और कुछ नही।

धन्यवाद। 

जयहिन्द, जय भारत।

नोट: यह पोस्ट राजनीति से प्रेरित नही इसीलिए अगर किन्ही को राजनीतिक कमेंट करना है तो वे ना करे।

छठ महापर्व या प्रकृति का सम्मान


wp-1478252870556.pngछठ महापर्व सिर्फ लोक आस्था का पर्व नहीं है यह एक ऐसा पर्व है जो प्रकृति में आस्था को जागृत करता है और मनुष्य का प्रकृति के प्रति आगाध प्रेम को दर्शाता है। मैं तो इससे ज्यादा ऊपर जाकर यह कहूंगा कि यह एक मात्र हिन्दू पर्व है जिसमे किसी भी तरह की प्राकृतिक क्षति को व्यवहार में नहीं लाकर प्रकृति के प्रेम को दर्शाया जाता है जो किसी और हिन्दू पर्व में नहीं है।

छठ महापर्व में डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देकर अपनी आस्था और और अपने विश्वास के साथ साथ लोग अपनी कृतज्ञता दर्शाते है जो किसी और पर्व में नहीं। सूर्य को अर्घ्य तो हिन्दू लोग रोज़ देते है लेकिन छठ महापर्व की खासियत यह है कि आपको नदी या तालाब में जाकर सूर्य को अर्घ्य देना होता है। अगर आप नजदीक से छठ पूजा में उपयोग होने वाले प्रसाद के रूप में या किसी भी तरह उपयोग होने वाले सामानों का प्रकृति से गहरा नाता होता है जो यह साबित करता है कि इस पर्व को मनाने वाले व्रतियों का प्रकृति के प्रति सम्मान दर्शाता है।

हम जो वाकई में प्रकृति का सम्मान करना भूल गए है यह महापर्व हमें उसके प्रति जागरूक करता है चाहे वह सामाजिक साफ सफाई की बात हो या लोगो का आपस में घाटो पर विचारो का आदान प्रदान जिसकी हमें आज के आधुनिक और डिजिटल युग में बहुत ही जरुरत है उससे रूबरू करवाता है।

आशा करते है हम जितना सम्मान इस पर्व के दौरान लोगो के साथ साथ प्रकृति का करते है उतना ही सम्मान महापर्व के ख़त्म होने के बाद भी करेंगे। यह हमारे लिए सालों भर एक प्रकार होना चाहिए तभी वाकई में सूर्य या प्रकृति के प्रति हमारी सच्ची अर्घ्य होगी।

आप सभी को एक बार फिर से छठ महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं और आशा करते है यह महापर्व आपके और आपके पूरे परिवार को मानसिक शांति के साथ साथ आने साल में सुख और समृद्धि प्रदान करे।