भारतीय नोटों का विमुद्रिकरण


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Indian Rupee Symbol

मुझे बड़ा आश्चर्य होता है जब हमारे सोशल मीडिया के बुद्धिजीवी कह रहे है कि 500 और 1000 के नोट पर बैन से लोगो को तकलीफ हो रही है। तो मैं आपको सही करने की कोशिश करता हूँ क्योंकि यहाँ पर आप तकनिकी तौर पर कतई सही नहीं है क्योंकि 500 और 1000 के नोट बैन नहीं हुए है सरकार आपसे कह रही है कि आप इसको नए नोट के साथ बदले। इसको अर्थशास्त्र की भाषा में विमुद्रिकरण कहते है। क्यों बदलना है क्योंकि सरकार को लगता है जो 500 और 1000 के नोटों के रूप में जो नकली नोट मार्किट में हर दिन भेजा जाता है आतंकवादी संगठनों और नशे के व्यापारियों द्वारा अगले कुछ सालों तक उसपर लगाम लगी रहेगी। वैसे भी अम्बेडकर साहेब कह गए की हर दसवें साल हमें अपनी मुद्रा जो सबसे ज्यादा प्रचलन में हो उसे बदल देना चाहिए।

यह नोट को बदलवाने की प्रक्रिया में कुछ समय लग सकता है। कोई कहेंगे की बैंक इसको अपनी तरफ से लगातार इस बात को करके भी कर सकते थे, क्यों अचानक से यह किया गया। अगर बैंक लगातार इस कोशिश को करती शायद मुमकिन है जिनके पास बिना मूल्यांकन वाली आय है उस पैसे को भी बदल दिया जाता।

यह कोई आज लिया गया फैसला नहीं कह सकते है बातो में तह पर जाने की कोशिश करे फिर पता चलेगा कि बात कहाँ से शुरू होकर यहाँ तक पहुंची है।

१) सबसे पहले जन धन योजना लागू कर उनलोगों को अर्थशास्त्र की मुख्य धारा में जोड़ने की कोशिश।

२) उसके बाद सारे सब्सिडी को बैंक अकाउंट और आधार कार्ड के साथ लिंक करना।

३) उसके बाद ITR को पैन के साथ साथ आधार या पासपोर्ट के साथ लिंक करना।

४) उसके बाद का यह कदम साबित करता है सरकार ने इस कदम को उठाने दो साल पहले से तैयारी शुरू कर दी थी।

लेकिन इस विमुद्रिकरण को और सही तरीके से लागू किया जा सकता था। जिसको आप सरकार की गलती के तौर पर देख सकते है। जो मेरे ख्याल से निम्न उपाय किये जा सकते थे:

१) 1 महीने पहले से ATM में 100 के नोट डालने थे 500 और 1000 के नोट को कम करते जाना था दिन ब दिन।

२) RBI को 1000 और 500 के नोट वापस लेते रहने चाहिए थे ताकि मार्किट में 1000 और 500 का नोटों का व्यवहार कम होता जाता।

३) RBI को 100 के नोट का सही व्यवहार में आने का इंतज़ार करते रहना चाहिए था। हो सके तो और 100 के नोटों को छापकर मार्किट में डालते रहना चाहिए था ताकि 500 और 1000 के नोट के वापस लेते रहने से मार्किट में पैसे की कमी से निपटा जा सकता था।

४) 1 महीने पहले से ATM का अपग्रेड शुरू कर देना चाहिए था।

धन्यवाद।

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अभिव्यक्ति की आज़ादी या देशभक्ति या कुछ और


कुछ लोग कहते है की अगर आपने एक पार्टी के विरोध में कुछ बोला नहीं की आप देशद्रोही हो गए और दूसरी तरफ दूसरे लोग यही बात कहते है अगर आपने एक पार्टी के विरोध में बोला नहीं की आपको भक्त करार दिया जायेगा। जैसे अगर किसी ने आज की तारीख में यह बोल दिया की JNU में देशद्रोही नारे लगे तो बीजेपी वाले लोगो की नज़र में आप देशभक्त होते है या नहीं लेकिन दूसरी तरफ वाले आपको मोदी भक्त या आरएसएस का एजेंट या कट्टर हिंदूवादी या भक्त जरूर कहते नज़र आ जाएंगे। अब इसी का दूसरा पहलु देखते है अगर किसी ने यह कह दिया JNU में जो नारे लगे वह देशद्रोही तो है लेकिन….? तो आपको जो कल तक मोदी भक्त कहते हुए नज़र आ रहे थे आज आपको देश का सच्चा देशभक्त कहता हुआ नज़र आएगा और दूसरी तरफ वाला आपको देशद्रोही, पाकिस्तानी समर्थक, वामपंथी कहता हुआ नज़र आएगा। आखिर आम आदमी जाये तो जाये कहाँ। इसी वजह से बहुत सारे लोग खुल के यह बात कह नहीं पाते है उनके मन में क्या है। तो यही वजह है की कुछ लोग इन झमेलों से अपने आप को दूर रखने की यथासंभव कोशिश कर रहे है।

सबसे ज्यादा तो तरस आता है पढ़े लिखे नौजवानो पर जो की जीवन में किसी ना किसी तरह एक खास राजनितिक आइडियोलॉजी को सपोर्ट करते है, और किसी राजनैतिक आइडियोलॉजी का समर्थन करना गलत नहीं है।

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JNU के माननीय सदस्यों से अपील


StandWithJNU कुछ लोग इस शब्द को लगता है फैशन स्टेटमेंट की तरह लेने लगे है, वैसे ही जैसे कुछ पत्रकार यह कहने लगे है मैं देशद्रोही हूँ। ऐसे शब्दों का चुनाव करने वालो को देखकर ऐसा लगता है जैसे एक ऐसे मुद्दे को भटकाने की कोशिश में लगे है जो वाकई में एक सभ्य समाज के लिए खतरनाक है। अंग्रेजी में पढ़ने और लिखने वाले अपने को छोड़कर किसी और की बुद्धिमत्ता को कमतर आंकते है या उन्हें किसी खास एक पार्टी के विचारधारा से मिलाकर देखते है।

JNU को भारत में सर्वश्रेष्ठ भारत के विद्यार्थियों ने बनाया और इसमें किसी एक व्यक्ति का योगदान नहीं माना जा सकता है और यह एक दिन की मेंहनत नहीं है।

JNU एक विश्वविद्यालय ही नही है, यह एक जज्बा है, यह एक परंपरा है, यह एक शान है, जो कभी भी एक झटके में खत्म नहीं हो सकता है। यह जैसे आपकी शान है हमारी भी शान है और हम भी गर्व से कहते है, JNU हमारे देश में है। लेकिन जो अभद्र भाषा का उपयोग किया गया देश के लिए क्या वह सही है।

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JNURow – खोखली बुद्धिमत्ता या अतिदेशभक्ति


ये कहाँ थे जब मालदा और पूर्णिया में लोकतंत्र का मखौल उड़ाया गया। तब इनकी बुद्धिजीविता विदेश भ्रमण को गयी थी। अगर सरकार और उसके खिलाफ कुछ बोलना है बोले आपको पूरा हक़ है लेकिन देश के टुकड़े हज़ार करके के आप क्या साबित करना चाहते है। सरकार के खिलाफ आपको बोलने में डर लगता है। हम बड़ी जल्दी भूल जाते है मुम्बई एक लड़के को कार्टून बनाने के चक्कर में देशद्रोह का मुकदमा लगाया गया था तब किसी ने नहीं बोला क्यों क्योंकी वह आम आदमी था। क्या मुझे यही नारे लगाने की आज़ादी मिलेगी सड़को पर शायद नही। मेरा सिर्फ एक ही कहना है अगर एक बात कहने की आज़ादी लेखक, बुद्धिजीवी, नेताओ, विद्यार्थियों को है तो आम आदमी को क्यों नहीं। मतलब साफ़ है सरकार कोई भी हो वह सिर्फ दमन कर सकती है आवाज़ों को जो आम जनता से उठती है क्यों क्योंकि वहाँ उसके सपोर्ट में कोई खड़ा नहीं होना चाहता है। मुझे तरस आता है अपने आप पर लोग जो लोग राजनीती भविस्य की आड़ में देश की जनता की भावनाओ से खिलवाड़ करते है। अपने हिसाब से चीजो को इन्टरप्रेट करता है। हर व्यक्ति को है आपको भी है मुझे भी है लेकिन देश के टुकड़े हज़ार होंगे, हमे चाहिए आज़ादी। कौन सी आज़ादी की बात कर रहे है। JNU में पढ़ने वाले 30-40% विद्यार्थी स्नातक के क्या किसी ने उन्हें देखा किसी प्रोटेस्ट नहीं क्योंकि यही बड़े भाई बनते है उनको बोलते है अपने रूम में जाओ तुम्हारा पढ़ने का टाइम है। 10 बजे के बाद कोई भी स्नातक का विद्यार्थी ढाबे पर नहीं दीखता है क्या यह आज़ादी है।

अगर आप इतने बुद्धिजीवी है तो थोड़ा बुद्धिजीविता का परिचय दीजिये और मुखर हो के बोले की JNU में यह देश विरोधी नारे लगे। आप ऐसा कैसे कह सकते है तथाकथित देश विरोधी नारे। शब्दों का हेर फेर मुझे भलीभाँति समझ आता है भले कुछ लोग ना समझ पाये।

तो मेरा सवाल साफ़ है की अगर देशद्रोह है तो देशद्रोह है इसमें किंतु और परंतु कहाँ से आता है। क्या एक आम आदमी यही नारे लगाएगा तब क्या आप यही कहेंगे। अगर कोई राजनेता, विद्यार्थी, लेखक पर देशद्रोह का आरोप नहीं लगेगा तो किस पर लगेगा, आम आदमी पर। क्या आम आदमी की यह औकात है की ऐसा वह बोल पाये। तो सोचना आपको और हमको है की इन चंद वोट के लुटेरो से देश को बचाना है या यु ही घूंट घूंट कर जीने देना है देश को जहाँ एक तरफ हमारे जवान सीमाओं की सुरक्षा के लिए जीते और मरते है दूसरी तरफ ये चंद लोग इस देश की सहिष्णुता और एकता को खंडित करने की कोशिश कर रहे है।

कोई नहीं आया एक आम आदमी ही था मुम्बई का असीम त्रिवेदी, अख़लाक़ का क्या हुआ आम आदमी ही था, मालदा में क्या हुआ आम आदमी ही थे, पूर्णिया में क्या हुआ आम आदमी ही थे। जनाब आम आदमी के साथ कोई खड़ा नहीं होता और ना होगा क्योंकी वह आम आदमी जो ठहरा। ये सिर्फ बुद्दिजीवियों के लिए है, लेखको के लिए है, ये सिर्फ राजनेताओ के लिए है, ये सिर्फ पत्रकारो के लिए है। आम आदमी के लिए कुछ नहीं है कोई नहीं लड़ता। एक आम आदमी ही है जिसने तमिलनाडु सरकार के खिलाफ एक लोकगीत गाया और जेल में है।

सोचना आपको है क्योंकि आप किसी ना किसी तरह से इन संस्थानों में आपकी गाढ़ी कमाई का पैसा जरूर जाता है। और आपकी कमाई के पैसो से हमारे देश के कुछ अच्छे दिमाग को चुना जाता है इन संस्थानों में पढाई के लिए चुना जाता है ताकि आगे चल कर यही दिमाग भविष्य को तैयार करने में सहायक हो।

बोलने की आज़ादी या राजनीती


ऐसा लगता है जैसे हमारे यहाँ बोलने की आज़ादी का मतलब होता है अगर आप सरकार में है विरोध सहना और विपक्ष में है तो सरकार को पानी पी पी के कोसना। वही हाल कुछ घटनाओ को लेकर भी राजनितिक पार्टियां ऐसे रियेक्ट करती है जैसे ऐसा पहले कभी हुआ ही नहीं। यहाँ पर राजनितिक पार्टियां किसी भी घटने को हमेशा अपने नफे नुक्सान के लिए देखती है चाहे उसमे जनता का कितना नुक्सान ही क्यों ना हुआ हो।

ऐसा लगता है अगर आप स्कॉलर हो तो भारत में आपको कुछ भी बोलने का अधिकार हो जाता है और आम आदमी को एक शब्द भी बोलना भारी परता है सिस्टम या न्यायालय के खिलाफ़। क्योंकि हाल के दिनों जगजाहिर स्कॉलर ने उच्चतम न्यायलय के फैसलो के विरुद्ध भी बाते कही है। क्या वे न्यायालय की अवमानना नहीं थी? मुझे नहीं लगता कोई आम आदमी ऐसी हिमाकत कर सकता है। क्या कोई उन्हें समझायेगा की अगर आपको बोलने की आज़ादी है तो इसका मतलब ये नहीं की आप देश के विरुद्ध बोलते रहे और देश को शर्मशार करते रहे।

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