दोहरे मापदंड का शिकार कौन?


अगर आप यह कहते है की JNU में जो हुआ वह बोलने की आज़ादी थी तो NIT श्रीनगर में जो हुआ वह क्या था देश द्रोह, कहाँ गए वे बुद्धिजीवी जो एक लाल सलाम का नाटक करने वाला जिसकी पीएचडी का मुख्य विषय ही अफ्रीकन पढ़ाई पर शोध करना हो और वह अफ्रीका के किसी देश में ना जाकर यही देश के अंदर नारा लगाने वाले को अभिव्यक्ति की आज़ादी खतरे में नहीं दिखती। कहाँ गए वे बुद्धिजीवी जो हिन्दुओ को गाली देना धरनिर्पेक्षतावाद समझते है। कहाँ गए वे बड़े बड़े बुद्धिजीवी जो टीवी स्क्रीन को काला करके अपने मन की भड़ास निकालते है। कहाँ गए वे जो स्टूडियो में बैठकर दूसरे पर चिल्लाकर अपनी बात कहलवाना चाहते है। कहाँ गए वे लोग जो देशभक्ति के नाम पर झंडा लेकर दुसरो की पिटाई कर रहे थे। आज भी किन्ही बुद्धिजीवी को एक कौम एक राज्य में खतरे में नहीं नज़र आती है। क्योंकि यही वह कौम है जो 90 के दशक में अपने घरो से खदेड़कर उन्हें अपने ही देश नहीं अपने ही राज्य में निर्वाषित जीवन जीने पर मजबूर किया गया। लेकिन एक व्यक्ति जो 10 व्यक्तियों की ग़लतियो की सजा भुगतता है तो इन बुद्धिजीवियों को उस व्यक्ति की कौम खतरे में नज़र आने लगती है।

फिर भी लोग मौन है क्यों।

हमे अपनी बात कहने का हक़ उतना ही है जितना इन बुद्धिजीवियों को। हमे अपनी आवाज़ उठानी है इन तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के खिलाफ़ जो अपने अवसरवादिता के तहत ये अपनी तथाकथित बुद्धिजीविता हमारे ऊपर थोपते रहते है। बस थोड़ा समय चाहिए और थोड़ा तार्किक शक्ति का परिचय दे, फिर आप इनके ही मुँह पर इनकी बात थोप सकते है। ये सारे टीवी पर बैठने वालो को गौर से देखे यह करते क्या है इनका ज्यादातर समय सरकार की कमियाँ निकालने में चली जाती है अच्छी न्यूज़ तो कोई दिखाना ही नहीं चाहता है। अगर इन सब से थोड़ा फुरसत मिल भी जाये तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर की न्यूज़ के साथ अपना मिलान करके आपको बेब्कुफ़ बनाते है ताकि आपको लगे की ये भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की न्यूज़ एजेंसी है, जबकि आप नज़र डालेंगे तो आपको पता चल जायेगा इनके पास दिखाने को अपने यहाँ के न्यूज़ की वीडियो तक नहीं होती है, ये पैसा देकर न्यूज़ वीडियो लेकर अपने चैनल पर चलाते रहेंगे। तो आप खुद सोच सकते है इनकी सार्वभौमिकता और इनका प्रसारण क्षेत्र कितना बड़ा है। सोचना चाहिए हमे की हम किनके पीछे जा रहे है न्यूज़ के लिए। इनका काम सिर्फ और सिर्फ आपकी भावनाओं को भड़काकर आपके सोच को खोखला करना है ना की आपको न्यूज़ के बारे में या उसकी गहराईओं के बारे में बताना। यह आपके दिमाग पर हावी होना चाहते है ताकी इनके पीछे का सच आप ना कभी जान सके और ना ही कभी समझ सके। इतने घोटाले होते है कभी इनमे से किसी के नाम को देखा है शायद नही एक आध आ भी गए तो अपनी पहुँच से छुट जाते है। कभी आपने यह सोचा है इनके मालिक कुछ ही सालो में इतने बड़े रसूखदार कैसे बन जाते है।

ज़रा सोचिये छात्रों को देश का भविस्य बताने वाले कुछ राजनेता कुछ ही दिनों में आपको नंगे नज़र नहीं आते जब दूसरे किसी भी छात्र जो इनकी मानसिकता को समर्थन नहीं देते है तो आपको इनके व्यवहार पर ऊँगली उठाने का पूरा हक़ है। उदाहरण के तौर पर राजनेता यह कहते है आप क्या खाये , क्या पिए यह सरकार निर्देशित नहीं कर सकती है। मैं शराब को प्रतिबंधित करने को गलत नही ठहरा रहा हूँ।  लेकिन अचानक से पुरे राज्य में शराब प्रतिबंधित कर देना क्या वही सोच नहीं दर्शाता। क्या आप आमजन के बारे में यह निर्णय नहीं ले रहे है की आप यह नहीं पी सकते, तो अगर कोई दूसरी सरकार खाने पर प्रतिबन्ध लगाती है तो आपको आपत्ति हो जाती है। यह आपका दोहरा चरित्र दिखाता है। एक दूसरा उदाहरण लेते है अभी अभी इसी राज्य के मुख्यमंत्री को एक राष्ट्रीय पार्टी का अध्य्क्ष चुना गया, तो आप उस पद को सहर्ष स्वीकार कर लेते है लेकिन दूसरी पार्टी का कोई नेता यही करे तो गलत। यह आम आदमी को समझना होगा की वह कीनको आदर्श मानते है, एक ऐसा व्यक्ति जो दोहरे चरित्र जीकर आपको ठगने की कोशिश कर रहा है। चाहे वे राजनेता हो या कोई टीवी पत्रकार।
धन्यवाद।

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