सामाजिक समरसता


अगर आज का भारत गाँधी जी जहाँ कही होंगे अगर देख रहे होंगे तो यह सोच के रो रहे होंगे क्या मैंने इसी भारत की तस्वीर देखी थी। अगर यही होना था तो क्यों ना अखंड भारत का सपना देखा।

दादरी उत्तर प्रदेश, मालदा पश्चिम बंगाल, पूर्णिया बिहार, फतेहपुर उत्तर प्रदेश, हरदा मध्य प्रदेश में अगर होने वाली घटनाओं का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है हम कितने असहिष्णु हो गए है। कहा गयी वो सामाजिक समरसता जब हमें अपने बचपन में कभी यह पता नहीं चला की हम कहाँ है और किसके साथ है। कभी हमारी माओं ने ये चिंता नहीं की, शाम हो गयी है मेरा बेटा कहाँ है और खाया या नहीं। लेकिन आज माओं को इस चिंता के बजाये इस बात की चिंता होती है की क्या हुआ होगा वो सही सलामत तो होगा, क्यों क्योंकि आज हमे अपने पड़ोसियों तक पर भरोसा नहीं रहा। क्योंकि हमारी वो जो आपस की एक अनजान डोरी हुआ करती थी जो हमे आपस में एक दूसरे से बांधे रखती थी वो कही टूटती सी नजर आती है। लेकिन मैं कहूँगा नहीं, ये हमारी सामाजिक समरसता आज भी है जो एक हिन्दू बेटी की शादी में एक मुस्लिम परिवार का कोई युवा अपना योगदान देता नजर आता है और कोई मुस्लिम परिवार की बेटी की शादी में हिन्दू युवा अपना योगदान देता नजर आता है। तो आखिर ऐसा क्यों है की वह अनजान धागा टूटता नजर आता है। ये सिर्फ और सिर्फ हमारे राजनितिक आकाओं की उपज है। क्यों, क्योंकि वे ये नहीं चाहते है की हम एक रहे क्योंकि इससे उनकी दूकान बंद होने का खतरा है।

अब आप सोचेंगे ऐसा मैं कैसे कह सकता हूँ। आप सोचे अगर किसी भी असेम्बली में सारे समुदाय एक मत से इस बात पर तैयार होते है की कोई उम्मीदवार हमारे लायक नहीं है और हम पूरी तरह चुनाव का बहिस्कार करेंगे तो क्या आज की तारीख में वहाँ पर सारे उम्मीदवारों को हटाकर दुबारा से चुनाव नहीं कराया जायेगा। तो सिर्फ इस एक उदाहरण के तौर आप सोच सकते है की ये राजनेता ही है जो ऐसा काम करते है।

जरुरी है राजनेता संभल जाये ऐसे कर्तव्यों से और ऐसे वक्तव्यों को देने से बचे वरना उनकी साख तो जायेगी ही साथ में उनकी अपनी पार्टी की भी साख जाती नजर आएँगी। यहाँ पर कुछ राजनेता जो कुछ ना कुछ हमेशा बोलते रहते है और जब भी बोलते है उससे आपस के समुदायो में तनाव बढ़ता है। लेकिन जब तक इन राजनेताओ को हम अपना मसीहा समझते रहेंगे तब तक ये हमारा इसी तरह फायदा उठाते रहेंगे। ये नेता कभी हिन्दू-मुस्लिम कह के डराते है कभी मुस्लिम-हिन्दू कह के डराते है, कभी ईसाइ-हिन्दू कह के डराते है कभी हिंदु-ईसाई कह के डराते है। जरा सोचिये इनके हाथ में पुरे राज्य की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी होती और ऐसे कैसे एक जगह कुछ लाख या कुछ हज़ार लोग अचानक जमा हो जाते है और ऐसा कुछ कर जाते है जो मानवता के नाम पर कलंक है। क्या कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की नहीं है? कभी आपने सोचा है की किसी राजनेता के किसी रैली में ऐसी घटनाये क्यों नहीं होती है। कभी कोई राजनेता किसी बम्ब ब्लास्ट में नहीं मरता। क्योंकि जहाँ ये राजनेता होते है वहां की सुरक्षा चाक चौबंद होती है। जरा सोचिए हम राजनेता से है या राजनेता हमसे है। तो आखिर मरता कौन है आम आदमी कोई राजनेता क्यों नहीं। हमारे चुने हुए नेता को हमसे क्या खतरा जो हमसे ही नहीं मिलते चुनाव के बाद। चुनाव के पहले तक तो इनको जहाँ चाहो बिठा लो कोई फर्क नहीं परता, चुनाव जितने के बाद ही ये भीआईपी हो जाते है। मैं यहाँ छोटा सा उदाहरण देना चाहूँगा की मेरे क्षेत्र का सांसद कभी मेरे गाँव नहीं आता चुनाव जितने के बाद लेकिन चुनाव से पहले कई दफा मैंने उन्हें अपने गाँव में देखा है खड़े खड़े बात करते हुए किसी भी अनजान व्यक्ति से, मोटरसाइकिल पर भ्रमण करते हुए कई बार गुफ्तगू करने का भी मौका लगा लेकिन अगर मैं दिल्ली में उनसे मिलना चाहू तो शायद यह संभव नहीं क्योंकि दिल्ली आते ही वे एक भीआईपी हो जाते है। शायद संसद में वे सोनिया गांधी जी के बगल में हमेशा बैठे नजर आते है शायद नहीं भी। और आज तक कभी एक सवाल करते नहीं देखा और ना ही सुना। मैं यह नहीं कहता की आप सोनिया गांधी जी के बगल में ना बैठे लेकिन कम से कम अपने राजनितिक धर्म का तो पालन करे संसद में। अगर किन्ही राजनेताओं को सही मे खतरा है तो आप उन्हें सुरक्षा दीजिये लेकिन बांकी जनता के साथ तो ऐसा ना करे उनसे राजनेता मिले बात करे तभी उन्हें पता चल पायेगा की क्षेत्र में क्या कमी है जिसे दूर करने का प्रयास किया जाये। बात करने से बात बनती है।

तो जरुरत है हमे जागने की हम क्या है और हमे क्या चाहिए। जरुरत है हमे यह समझने की कौन सही है कौन गलत। कभी य राजनेताे बोलेंगे जोर जोर से जैसे इनका कोई सगा मर गया हो कभी यह चुपचाप परे रहते है एक शब्द मुँह से नहीं निकालते, क्यों क्योंकि वोट की राजनीती जो ठहरी। तो मतलब है इन्हें और इनकी मानसिकता को समझने की तभी हम इनके खिलाफ खड़े हो पाएंगे।  कुछ लोग दादरी पर चिल्ला चिल्ला के बहुत कुछ बोल गए लेकिन मालदा और पूर्णिया जैसी घटनाओं के बारे में कुछ नहीं बोला। जिन लोगों ने मालदा और पूर्णिया की घटनाओं पे गला फाड़ के चिल्लाये वे कभी दादरी और हरदा जैसी घटनाओ पर चुप्पी साध ली। क्या हम इतने बेवकूफ है हमे समझ नहीं आता की कौन क्या कह रहा है कैसे कह रहा है। या हम सुनना नहीं चाहते है। मुझे नहीं लगता है की हम ऐसे हो गए है की हम यही सुनना चाहते हो। या कुछ और है जिसकी वजह से हम चुप रहते है।

तो मैं यही कहना चाहता हूँ की आप अफवाहों पर ध्यान ना दे जबतक आपको विश्वस्त सूत्रो से पता ना चले। आप राजनेताओ की बात माने लेकिन उससे पहले अपने विवेक का उपयोग अवश्य करे। मैं अपने पढ़े लिखे युवा मित्रो से कहूँगा की आप भी किसी भी बात को फैलाने से पहले उसके बारे में कुछ जांच पड़ताल अवश्य करे। आज का जमाना इतना मॉडर्न है की आप एक क्लिक से किसी भी न्यूज़ के बारे में तुरंत पता लगा सकते है। तो कही भी शेयर करने से पहले उस न्यूज़ के इम्पैक्ट के बारे में अवश्य सोचे, क्योंकि आपके एक शेयर करने से जाने अनजाने में आप कई लाख नहीं तो कई हजार लोगो तक अपनी बात पहुँचाने में सक्षम है। आप पढ़े लिखे है आपसे उम्मीद की जाती है की आप अपने समाज को दिशा दिखाए और सही दिशा दिखाए, ताकि उनके जीवन में सुधार हो सके। आप इस बात से कतई इनकार नहीं कर सकते की आप अकेले के करने से क्या होता है आप करे तो सही। और आपकी समाज के प्रति कुछ जिम्मेदारी बनती है उसका अवश्य निर्वाह करे। चाहे जैसे करे अवश्य करे हर एक बात को सरकार के सिर पे छोड़ देना सही नहीं है। आप अपने आँख और कान हमेशा खुले रखे की आस पास क्या हो रहा है अगर गलत हो रहा है तो पूछे जरूर, पूछने में क्या जाता है।
जय हिन्द जय भारत।

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