किसानो की बदहाली या सरकारी उपेक्षा


एक रिपोर्ट आई थी २१ दिसंबर २०१५ को रात ९ बजे ज़ी न्यूज़ के कार्यक्रम डीएनए में “बुंदेलखंड में बदहाल किसान”. क्या ये सिर्फ बुंदेलखंड के किसानो की हालात है? या ये सिर्फ महाराष्ट्र के किसानो की हालात है? या ये सिर्फ आंध्र प्रदेश या तेलंगाना या उड़ीसा या झारखण्ड या फिर राजस्थान के किसानो की हालात है? अगर आप थोड़ी सी फौरी नजर डाले तो पुरे देश के किसानो के बारे में तो जिस तरह के न्यूज़ गाहे बगाहे कुछ कद्दावर पत्रकारो द्वारा प्रकाशित या दिखाई जाती है उससे ये तो साफ़ है ये समस्या जितनी दिखती है उससे कही ज्यादा संवेदनशील है। लेकिन टीवी चैंनल वाले भी क्या करे उन्हें भी पैसे कमाने है अपने पेट भरने है तो कुछ असंवेदनशील मुद्दे तो उठेंगे ही और उन्ही कुछ मुद्दों पर सोशल मीडिया में बहस भी होगी क्योंकि उन्ही न्यूज़ की वजह से इनकी टीरपी बढ़ती है। आज की तारीख में टीरपी नहीं तो कुछ नहीं क्योंकि जितनी बड़ी टीरपी उतनी बड़ी कमर्शियल उपलब्धि। आखिर इतने बड़े बड़े लोग इन मीडिया हाउस के पीछे बैठे किस लिये है पैसे कमाने के लिए ही तो तो फिर न्यूज़ को संवेदनशील बना के फायदा न उठाया जाये।

जैसे कॉर्पोरेट हाउसेस के लिए सीसआर एक सेक्शन होता है आपको अपनी कमाई का कुछ हिस्सा समाज को वापस करना होता है वैसे ही ऐसा कुछ कानून इन न्यूज़ चैनल्स पे लागु नहीं होना चाहिए की उन्हें भी हम बाध्य करे की आप अपने पुरे एयर टाइम का कुछ हिस्सा समाज से जुड़ी खबरों पे जैसे की सरकार के अनेक कार्यक्रम जो आम जनता के लिए जानना जरुरी होता है उसे बताये उससे जुड़ी अच्छी बुरी पहलु को भी बताये। इससे दो फायदे होंगे १) सरकार को इन कार्यक्रमों को जनता तक पहुँचाने के लिए पैसे खर्चने नहीं पड़ेंगे २) किसी भी सरकारी कार्यक्रम का अच्छे से विश्लेषण हो पायेगा और सबसे बड़ी बात जनता तक बात आसानी से पहुंचाई जा सकेगी।

अगर हम बुंदेलखंड वाली रिपोर्ट को ही देखे तो हमे समझ में आता है की सरकारे कितनी असंवेदनशील हो गयी है पता चलता है। क्योंकि जिस बुंदेलखंड की बात इस रिपोर्ट में उठाई गयी है उसमे ये भी कही गयी है की तक़रीबन १करोड़ से ज्यादा आदमी इस भुखमरी के कगार पे है तो मेरा सवाल सरकार से सिर्फ इतना है की क्या सरकारी महकमो को इससे जुड़ी किसी भी समस्या का कुछ भी ज्ञान नहीं है अगर नहीं तो आप सरकार में रहने लायक नहीं है क्योंकि जहाँ पे इतनी बड़ी तादाद में लोग भुखमरी की समस्या से जूझ रहेे है और आप कहे आपको कुछ पता नही तो ये समझ से परे है। और अगर आप ये कहे की आपको सब कुछ ज्ञात है इस मामले में फिर भी आप कुछ नहीं कर रहे है या नहीं कर पा रहे है तो आप असंवेदनशील है।

लेकिन बेचारे न्यूज़ चैनल्स वाले भी क्या करेंगे जब हमारे संसद में जब इन मुद्दों पर चर्चा के बजाये असहिष्णुता पे चर्चा को प्रार्थमिकता दी जाती है तो टीवी चैनल्स पे इस बात की कितनी जिम्मेदारी डाली जा सकती है। जनता के चुने हुए नेता जो जनता के लिये काम करने को बाध्य होते है वो ही इन मुद्दों पर बात करना नहीं चाहते तो हम न्यूज़ चैनल्स से इससे ज्यादा अपेक्षा नहीं कर सकते। खैर यहाँ पर असहिष्णुता पे चर्चा करना ठीक नहीं होगा क्योंकि जिस मुद्दे पे बात करने के लिये ये लेख जिस ओर अग्रसर हुआ ही उसी और हमे बढ़ना चाहिए मुद्दे से भटकना नहीं चाहिए। जिस देश की ६०% जनता अभी भी कृषि या उससे आधारित उद्योगों पे आश्रित हो पर आप सांसदों का उसकी चर्चा से भागना ये दर्शाता है की आप कितने असंवेदनशील है। जहाँ इस दुनिया के लगभग सारे विकशित देश अपने अपने किसानो के हितो की रक्षा करने के लिए डब्लूटीओ जैसे संस्थानों से पंगा लेने से नहीं हिचकते वही आप अपने देश के किसानो और उससे जुड़ी समस्याओ से बात करने में कतराते है। तो इससे पता चलता है की आप कितने असंवेदनशील है।

आप जहाँ बिज़नेस घरानो को कुछ एक जगह बिज़नेस करने पर सब्सिडी देने से नहीं चूकते वही आप किसानो को उनके खाद और बीज पर सब्सिडी देने से कतराते है। और ये कह के पल्ला झार लेते है की इससे अर्थव्यवस्था पे कितना असर पड़ेगा। क्या आपने कभी इस बात का आकलन किया है अगर एक बार किसान फसल कम उपजाते है तो आपकी अर्थव्यवस्था पे कितना असर पड़ता है? क्या आपने कभी कभी सोचा है आपकी अर्थव्यवस्था का सकल घरेलू उत्पाद का कुछ प्रतिशत सही मानसून ना होने पर निर्भर करता है? २१वी सदी में भी हम अच्छे मानसून को सोचते है और फसल अच्छी हो और हमारी लंगड़ी लुल्ली कृषि सकल घरेलु उत्पाद में कुछ इज़ाफ़ा कर सके।

जब तक सरकार में और संसद में असंवेदनशील लोग मौजूद होंगे तबतक इस देश का और इस देश के किसानो का कुछ नहीं हो सकता है। मैं नहीं कहता सरकार और संसद में बैठे सारे लोग निक्कमे, नकारे और असंवेदनशील है लेकिन कुछ लोग तो है ही जिन्हें इन सब बातो से कुछ फर्क नहीं पड़ता। हमारी सकल घरेलु उत्पाद सिर्फ सेवा या अन्य क्षेत्र से जुड़ी क्षेत्र से बढ़ती/घटती नहीं है। जिस देश के सकल घरेलु उत्पाद का बड़ा हिस्सा कृषि या उससे जुड़ी उद्योगों पर निर्भर हो वहाँ के निति निर्माताओ का इस क्षेत्र का इस तरह से उपेक्षा करना कतई सही ठहराया नहीं जा सकता है। जरुरत है हमे अपने नजरिये पर पुनर्विचार करने की और नए सिरे से सोचने की। आप सोचे जहाँ आपकी ६०% जनता जिस क्षेत्र से जुड़ी हो अगर आप उनसे जुड़ी कल्याणकारी योजनाओ को लागु करेंगे और अच्छे से अनुपालन करवाएंगे तो देश कहाँ से कहाँ पहुंचेगा। बस हमे उनके नब्ज़ को पकड़ना है कहाँ हमसे चूक हुई ये पता लगाना है और उससे निपटने के उपाय सोचने है। पहले सोच तो बदले फिर देखे वही किसान आपकी अर्थव्यवस्था को कहाँ से कहाँ पहुंचाते है। एक बात हम भूल रहे है यही भारत था जिसपे राज़ करने के लिए अंग्रेज़ो ने इतनी मेहनत की साम दाम दंड भेद निति अपनाये, क्या भारत में उस समय बड़ी बड़ी इंडस्ट्री हुआ करती थी नहीं तो अंग्रेज भारत क्या करने आये थे। बस इस प्रश्न के उत्तर में झांकने की जरुरत है तो हम सोच पाएंगे की हमारे किसान हमे कहाँ से कहाँ पहुँचा सकते है। बस सिर्फ सोच/नजरिया बदलने की जरुरत है।
जय हिन्द जय भारत!

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One thought on “किसानो की बदहाली या सरकारी उपेक्षा

  1. Harishankar kumar

    सरकार तो असंवेदनशील रही है पिछले 65 वषौं से. अगर संवेदनशील होती तो देश की ये हालात तो नही ही होती.

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