सोशल मिडिया पर डेटा चोरी


लोग डेटा चोरी का आरोप प्रत्यारोप वाला खेल में मग्न है लेकिन जब आप 10 रुपैया कैशबैक के चक्कर मे अपना फ़ोन नंबर, ईमेल आईडी या अपना लोकेशन शेयर करते है तब शायद आप यह नही सोचते है। लेकिन चूँकि राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी ने एक दूसरे के प्रति यह बात उठाई है तो कही ना कही हम भारतीय पैदायशी राजनैतिक गुरु होने के नाते हम भी इस छींटाकशी में सम्मिलित हो जाते है।

क्या आप आज की तारीख में अगर आप स्मार्टफोन उपभोक्ता है तो सोच सकते है किसी भी एप्प को मैं अपना मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी या अपनी लोकेशन नही दूँगा तो बेहतर है आप बेसिक मोबाइल ही उपयोग कर लीजिए। क्योंकि स्मार्टफोन का मतलब साफ है आप कही ना कही आप किसी ना किसी एप्प को अपनी व्यक्तिगत जानकारी दे ही रहे है चाहे ना चाहते हुए ही सही लेकिन आप दे तो रहे है उन्हें अपने डेटाबेस में संग्रह करने के लिए फिर क्यों इतना हाय तौबा क्या इसीलिए क्योंकि आपकी अपनी राजनैतिक पार्टी आप जिसका समर्थन करते है उन्होंने अपनी विपक्षी पार्टी पर आरोप लगाया है।

आप यही उस भ्रमजाल में फंस रहे है जिसका नाम शार्क है आप कही भी जाएंगे एक शार्क से बचेंगे लेकिन दूसरी शार्क आपको निगलने के लिए तैयार बैठी है। तो आप यह मान के चलिये की आपका निगला जाना तय है तो आप किस शार्क के द्वारा निगल जाना पसंद करेंगे यह आपकी इच्छा पर निर्भर है।

आपको दुनिया मे कोई भी चीज मुफ्त में उपलब्ध नही है तो आप सोचिये की जिसका आप अपने हाथ मे रखे स्मार्टफोन से इतना ज्यादा इस्तेमाल करते है तो एक सॉफ्टवेयर अभियंता से पता कीजिये उसका मूल्य क्या हो सकता है जिसका आप बिना किसी मूल्य के उपयोग कर रहे है तो आपको खुद बखुद अंदाजा हो जाएगा कि आपको मुफ्त में क्यों मिल रहा है। अगर इतनी महंगी चीज आपको मुफ्त में मिल रही है तो सोचना आपको होगा कही आप खुद तो पैसे बना के तो नही दे रहे है। जी आप खुद उसके ग्राहक है जिसको वह पैसे के लिए कभी भी कुछ भी परोस रहा है।

जितनी मेरी अनुभव कहती है उसके हिसाब फेसबुक या कोई भी ऐसी जगह जो आपको मुफ्त में इतनी सारी सूचनाएं प्रदान करता है कही ना कही आपकी गोपनीयता को गोपनीय तरीके से किसी ना किसी प्रकार किसी और को गोपनीय तरीके से परोस रहा है।

तो सिर्फ सुरक्षा संबंधी बातो का ध्यान ना रखे अपने प्रोफाइल से हो रही गतिविधियों के प्रति सजग रहे। क्योंकि 99℅ भारतीय जो सोशल मीडिया उपयोग करते है उनको यह पता तक नही होता है कि क्या हो रहा है कैसे हो रहा है। और कई बार ऐसी बाते साझा करते है जिनके बारे में बाद में पछताते है। जिससे आपकी पसंद, नापसंद, खाना, पीना, अच्छा,खराब, आप कहाँ कहाँ जाते है सबकी जानकारी साझा करते है जिससे एक आम इंसान भी आपके प्रोफाइल को देखकर आपके बारे में 80% बाते बता सकता है।

सजग रहिये सतर्क रहिये।
जय हिंद जय भारत।

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शेयरों में निवेश के 4 सुनहरे नियम


अगर आप शेयरों में निवेश करना चाहते हैं तो ये मुख्य चार बातें अवश्य याद रखें।
1. सही कंपनी चुनिये– मुनाफे में बढोत्तरी करने वाली तथा बेहतर कंपनी चुनें जिसने अपने शेयरधारकों की पूंजी पर कम से कम 20% लाभ अर्जित किया हो।
आदर्श रूप से एक दीर्घकालिक निवेश (5वर्ष से अधिक) आपको कंपनी के विकास में भाग लेने की अनुमति देता है।
कम अवधि( 3 से 6 महीने) में शेयर का प्रदर्शन कंपनी के मूल सिध्दांत से कम तथा बाजार भाव से अधिक प्रेरित होता है। जबकि लंबे काल में सही कीमत की प्रासंगिकता कम हो जाती है।

2.अनुशासित रहें– शेयर में निवेश एक लंबी सीखने की प्रक्रिया है,जिसमें आप अपनी गलतियों से सीखते हैं। ये कुछ तथ्य हैं जिनसे ये प्रक्रिया सरल हो सकती है।
निवेश में विविधता- किसी एक शेयर में अपने कोष का 10% से ज्यादा न डालें भले ही वो एक रत्न हो,दूसरी ओर बहुत अधिक शेयरों में भी निवेश न करें क्योंकि उनकी निगरानी करना मुश्किल होता है। एक कम सक्रिय लंबी अवधि के निवेशक के लिये 15-20 विभिन्न शेयर अच्छी संख्य़ा है।
इस asset allocation tool का प्रयोग करें जिससे ये पता लगाया जा सके कि आपको शेयरों से अतिरिक्त निवेश करने की जरूरत है क्या।
.अपनी कंपनी के प्रदर्शन का विश्लेषण उसके तिमाही परिणाम, वार्षिक रिपोर्ट और समाचार लेखों से करते रहें।
.एक अच्छा ब्रोकर ढूंढे तथा निपटान प्रणाली समझें।
.हॉट टिप्स पर ध्यान न दें क्योंकि अगर ये सच में काम करती तो हम सब करोङपति होते।
.और अधिक खरीदने के प्रलोभन से बचें क्योंकि प्रत्येक खरीद एक नये निवेश का निर्णय है। एक कंपनी के उतने ही शेयर खरीदें जितने आपके कुल आवंटन योजना के अनुसार हैं।

3.निगरानी और समीक्षा—अपने निवेश की नियमित निगरानी व समीक्षा करें। लिये गये शेयर के तिमाही परिणामों की घोषणा पर नजर रखें और सप्ताह में कम से कम एक बार अपने पोर्टफोलियो वर्कशीट पर शेयर की कीमतों में आये सुधार लिखते रहें। ये कार्य अस्थिर समय के लिये ज्यादा महत्वपूर्ण है जब आप मूल्य चुनने के लिये बेहतर अवसर पा सकते हैं।
जैसे कि पता लगायें कि आप 50 पैसे के सिक्के में 1 रूपये के सिक्के कैसे खरीद सकते हैं buy 1 rupee coins at 50 paise
इसके अलावा ये भी जांचे कि जिन कारणों से आपने पहले शेयर खरीदा था वे अभी भी वैध हैं य़ा आपके पहले के अनुमानों और उम्मीदों में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। साथ ही एक वार्षिक समीक्षा प्रक्रिया अपनायें जिससे आप अपने कुल परिसंपत्ति आवंटन के भीतर इक्विटी शेयरों के प्रदर्शन की जांच कर सकें।
अगर जरूरी हो तो आप RiskAnalyser पर समीक्षा कर सकते हैं क्योंकि आपके जोखिम प्रोफाइल और जोखिम क्षमता में 12 महीने की अवधि में परिवर्तन हो सकता है।

4. गलतियों से सीखें– समीक्षा के दौरान अपनी गलतियों को पहचानें और उनसे सीखें,क्योंकि आपके खुद के अनुभव को कोई नही हरा सकता। यही अनुभव आपके ‘ ज्ञान के मोती ’ बनेंगे जो निश्चित ही आपको एक सफल शेयर निवेशक बनाने में सहायक होंगे।

श्रोत: मनीकण्ट्रोल.कॉम

सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान(SIP)क्या है?


invest-1SIP नियमित रूप से निवेश के सिद्धांत पर काम करता है। यह आपके आवर्ती जमा की तरह है जिसमें आप हर महिने कुछ छोटी राशि डालते हैं।

ये आपको एक बार में भारी पैसा निवेश करने की जगह म्यूचुअल फंड में कम अवधि का (मासिक या त्रैमासिक) निवेश करने की आजादी देता है। SIP आपको एक म्युचुअल फंड में एकसाथ 5,000 रूपये के निवेश की बजाय 500 रूपये के 10 बंटे हुये निवेश की सुविधा देता है ।

इससे आप अपनी अन्य वित्तीय जिम्मेदारियों को प्रभावित किये बिना म्यूचुअल फंड में निवेश कर सकते हैं। SIP कैसे काम करता है ये बेहतर समझने के लिये आपको Rupee cost averaging और धन के जुङते रहने की शक्ति (power of compounding) को समझना जरूरी है।

SIP एक औसत आदमी की पहुंच के भीतर म्यूचुअल फंड निवेश को ले आया है क्योंकि यह उन तंग बजट लोगों को भी निवेश करने योग्य बनाता है जो एक बार में बङा निवेश करने के बजाय 500 या 1,000 रूपये नियमित रूप से निवेश कर सकते हैं।

SIP के माध्यम से छोटी छोटी बचत करना शायद पहली बार में आकर्षक न लगे लेकिन ये निवेशकों को बचत की आदत डालता है और बढते वर्षों में ये आपको सुंदर प्रतिलाभ (रिटर्न) देते हैं। 1,000 रूपये महिने का एक SIP का धन 9% की दर से 10 वर्षों में बढकर 6.69 लाख रूपये, 30 साल में 17.38 लाख रूपये और 40 साल में 44.20 लाख तक हो सकता है।

यही नही धनी लोगों को भी ये गलत समय और गलत जगह पर निवेश करने की आशंका से बचाता है। हांलाकि SIP का असली फायदा निचले स्तर पर निवेश करने से मिलता है।

SIP के अन्य लाभों में शामिल हैं—
1.अनुशासित निवेश-
अपने धन कोष को सुरक्षित बनाये रखने के मुख्य नियम हैं- लगातार निवेश करें,अपने निवेशों पर ध्यान केन्द्रित रखें और अपने निवेश के तरीके में अनुशासन बनाये रखें। हर महिने कुछ राशि अलग निकालने से आपकी मासिक आमदनी पर अधिक अन्तर नही पङेगा। आपके लिये भी बङे निवेश हेतु इकट्ठा पैसा निकालने से बेहतर होगा कि हर महिने कुछ रूपये बचाये जायें।

2.रूपये के जुङते रहने की शक्ति (Power of Compunding)
निवेश गुरू सुझाव देते हैं कि एक व्यक्ति को हमेशा जल्दी निवेश शुरू करना चाहिये इसका एक मुख्य कारण है चक्रवृद्धि ब्याज मिलने का लाभ। चलिये इसे एक उदाहरण से जानें। प्रसून(अ) 30 साल की उम्र से 1,000 रूपये हर साल बचाना शुरू करता है,वहीं प्रसूव (ब) भी इतना ही धन बचाता है लेकिन 35 साल की आयु से। जब 60 साल की उम्र में दोनों अपना निवेश किया हुआ पैसा प्राप्त करते हैं तो (अ) का फंड 12.23 लाख होता है और (ब) का केवल 7.89 लाख। इस उदाहरण में हम 8% की दर से रिटर्न मिलना मान सकते हैं। तो ये साफ है कि शुरू में 50,000 रूपये निवेश का फर्क आखिरी फंड पर 4 लाख से ज्यादा का प्रभाव डालता है। ये रूपये के जुङते रहने की शक्ति (Power of compounding) के कारण होता है। जितना लंबा समय आप निवेश करेंगे उतना ज्यादा आपको रिटर्न मिलेगा।

अब मान लीजिये कि (अ) हर साल 10,000 निवेश करने की बजाय 35 वर्ष की उम्र से हर 5 साल बाद 50,000 निवेश करता है इस स्थिति में उसकी निवेश किया धन उतना ही रहेगा (जो कि 3 लाख है) लेकिन उसे 60 साल की उम्र में 10.43 लाख का फंड (कोष) मिलता है। इससे पता चलता है कि देर से निवेश करने में समान धन डालने पर भी व्यक्ति शुरू में मिलने वाले चक्रवृद्धि ब्याज के फायदे को खो देता है।

3. रूपये की कीमत का औसत( Rupee Cost Averaging)
ये मुख्य रूप से शेयरों में निवेश के लिये उपयोगी है। जब आप एक फंड में लगातार अंतराल पर समान धन का निवेश करते हैं तो रूपये की कम कीमत के समय में आप शेयर की ज्यादा यूनिट खरीदते हैं। इस प्रकार समय के साथ आपकी प्रति शेयर या (प्रति यूनिट) औसत कीमत कम होती जाती है। यह रूपये की औसत लागत की नीति होती है जो एक लंबी अवधि के समझदार निवेश के लिये बनाई गयी है। ये सुविधा अस्थिर बाजार में निवेश के खतरे को कम करती है और बाजार के उतार चढाव भरे सफर में आपको सहज बनाये रखती है।

जो लोग SIP के माध्यम से निवेश करते हैं वे बाजार के उतार के समय को भी उतनी ही अच्छी तरह संभाल सकते हैं जैसे वो बाजार के चढाव के समय को। SIP के द्वारा आप के निवेश की औसत लागत कम होती है ,तब भी जब आप बाजार के उँचे या नीचे सभी प्रकार के दौर से गुजरते हैं।

4. सुविधाजनक
ये निवेश का बहुत ही आसान तरीका है। आपको केवल पूरे भरे हुये नामांकन फॉर्म के साथ चेक जमा करना होगा जिससे म्यूचु्अल फंड में आपके द्वारा कही गयी तारीख पर चेक जमा हो जायेगा और अपके खाते में शेयर यूनिट आ जायेंगी ।

5.अन्य लाभ—
• SIP निवेश में पैसा डालने या निकालने पर कोई टैक्स या शुल्क नही है।
• इसमें कैपिटल गेन पर लगने वाला टैक्स (जहां भी लागू होता है) निवेश करने के समय पर निर्भर होता है।

श्रोत: मनीकण्ट्रोल.कॉम

वास्तविक स्वतंत्रता या क्षद्म आज़ादी


स्वतंत्रता दिवस की सभी को शुभकामना!

आज की दिन 1947 की मध्य रात्रि को जब भारत आज़ाद हुआ था तो कितने बलिदानियों ने भारत की स्वतंत्रता के लिए हुए यज्ञ में अपनी अपनी आहुति दी थी इसका अंदाज़ा हमे नही हो सकता है क्योंकि हम स्वतंत्र भारत मे पैदा हुए बांस की कलम से लिखना शुरू कर आज पार्कर तक पहुंच गए। गिल्ली डंडा खेलते हुए आज कंप्यूटर पर हाई फाई गेम खेल लेते है। हमे आज़ादी और गुलामी में फर्क कहाँ पता। क्योंकि हम आजाद भारत में पैदा हुए ना। तो क्या आज के दिन का हमारे लिए कोई मायने नही रखता है। आज़ादी के 70 सालो बाद भी भले देश ने चांद की उचाईयों को आत्मसात किया हो। भले ही देश ने परमाणु सम्पन्न देश होने का गौरव हासिल किया हो। भले ही देश आज पूरे दुनिया मे कंप्यूटर के बेहतरीन दिमागों को एक्सपोर्ट करता हो। भले ही हमे संविधान ने बोलने की आज़ादी दी हुई हो लेकिन उस बोलने की आज़ादी में शब्दों को सूंघने का प्रयास बारंबार नही होता है, और लेकिन क्या हम उस बोलने की आज़ादी का दुरुपयोग करते हुए नज़र नही आते है।

भले ही देश हर पल आगे बढ़ने का दंभ भरता हो। लेकिन वाकई में क्या हमारा देश आजाद है या हम आजाद है?

वैसे तो भारत आज़ाद है लेकिन हमारी आज़ादी तबतक बेमानी है जब तक इस देश का कोई भी बच्चा फुटपाथ पर सोता है। हमारी आज़ादी तबतक बेमानी है जबतक इस देश का एक भी बच्चा ट्रैफिक पर भीख मांगता है। हमारी आज़ादी तबतक बेमानी है जबतक एक भी बुजुर्ग वृद्धाश्रम में रहता है। हमारी आज़ादी तबतक बेमानी है जबतक इस देश का एक भी नागरिक भूखा सोता है। हमारी आज़ादी तबतक बेमानी है जबतक एक भी व्यक्ति खुले में सोता है। हमारी आज़ादी तबतक बेमानी है जबतक इस देश का एक भी बच्चा स्कूल जाने से वंचित रह जाता है।

इसका हल क्या है क्या उपरोक्त सभी चीजों का हल निकालने की ज़िम्मेदारी से छुटकारा दिलाना सरकार का काम है शायद नही। तो क्या हम व्यक्तिगत तौर पर हम किसी भी प्रकार अपने सरकार या समाज की मदद कर सकते है। उसके लिए हमें अपनी अपनी व्यक्तिगत/सामाजिक ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करना पड़ेगा। तभी हम अपने देश को विकासशील से विकसित की तरफ ले जाने में सहायक सिद्ध हो सकते है।

पढ़े लिखे लोगो का समाजवाद या ढोंग


मुझे आश्चर्य होता है जब #प्रतिष्टित कहे जाने जैसे संस्थानों में पढ़े लिखे लोग बड़ी ही सावधानी से गरीब गुरबों की आवाज उठाने के नाम पर लालू यादव जैसे नेता का महिमामंडन करते है। जी हाँ ये वही लोग है जब लालू प्रसाद का बिहार की राजनीति में उदय हुआ तो इनलोगो ने कहा देखो इस व्यक्ति को कोई जानता तक नही था और आज मुख्यमंत्री है। लेकिन कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद बिहार सदन के नेता चुने गए और मुख्यमंत्री बनाये गए। अगर उस समय किसी समुदाय ने इसका विरोध किया तो यही समुदाय था कहते नही थकते थे कि इस आदमी को बोलने तक नही आता है और यह बिहार की मुख्यमंत्री बना बैठा है। इन सबके बावजूद लालू प्रसाद ने अपने अस्तितव को बचाने के लिए पिछड़े वर्ग की राजनीति शुरू की। याद रखिये यह वही दौर था जब बी पी मंडल का मंडल आयोग आया जिसका पूरे देश मे विरोध किया गया। और लालू प्रसाद के उस समय शुरू की गई पिछडो की राजनीति ने जो बिहार में पिछड़ो को आवाज दी और बिहार में एक नई राजनीतिक धुर्वीकरण का प्रादुर्भाव हुआ जिसने बिहार के साथ साथ देश के दो बड़े राज्यो में राजनीति की दिशा ही बदल दी। और यही से शुरू हुआ कहावतों का दौर जिसमे यह कहा जाने लगा कि जब तक रहेगा समोसे में आलू तबतक रहेगा बिहार में लालू। और यह कतई नही भूलना चाहिए कि बिहार में लगातार दो बड़ी विजय क्यों मिली क्योंकि बिहार के पिछड़े जिनके पास आवाज तक नही थी उनको लालू प्रसाद ने आवाज दी और राजनीति में उनके लिए दरवाजे खोल दिये। ध्यान रहे यही से शुरू हुआ लालू प्रसाद का नैतिक पतन जहाँ उन्होंने पिछड़ो की राजनीति के अलावा यादवों और मुस्लिमों की राजनीति शुरू की और दूसरी पिछड़ी जातियाँ जो उनको मसीहा समझ रहे थे, अपने आप को ठगा हुआ समझने लगे थे। यही से निरंकुशता शासन की तरफ से इस कदर बढ़ गयी जहाँ सिर्फ जाती देखकर सारे काम होने लग गए। सड़को का खस्ताहाल शुरू हो गया। शिक्षा में नैतिक पतन शुरू हुआ क्योंकि शिक्षकों को समय पर वेतन नही मिलने से वे ठगा सा महसूस करने लग गए थे। सबसे बुरा दौर तब शुरू हुआ जब मौत और अपहरण का तथाकथित उद्योग शुरू हुआ जिसने बिहार को सबसे ज्यादा बदनाम किया। और बाहर रहने वाले बिहारियों को बिहारी गाली लगना शुरू हुआ। सबसे बड़ा टैग तो पटना उच्च न्यायालय ने जंगल राज कह कर कोई कसर नही छोड़ी। पढ़े लिखे लोगो का पलायन जो तब शुरू हुआ जो बदस्तर आज भी जारी है। और उनलोगों ने तब यह कहना शुरू कर दिया था कि अब बिहार रहने लायक नही रहा और वे जब तब अपने आप को बिहारी कहने से अलग रखने लगे। यही नीतीश कुमार का प्रादुर्भाव हुआ, और जो दूसरी पिछड़ी जातियाँ लालू प्रसाद से अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे थे, नीतीश कुमार जी मे नई आशा की किरण की झलक दिखाई दी। जिसका फल यह हुआ कि नीतीश कुमार जी को नई आशा के साथ प्रदेश की बागडोर दी और पहले दो बार चुनाव जीतकर लोगो के भरोसे को कायम रखकर जिस तरह का जिन्न लगा होता था बिहारियों के सिर पर नीतीश जी ने उसको बहुत हद तक धोने का काम किया।

वाकई में लालू प्रसाद जी ने गरीब गुरबों को आवाज दी लेकिन उसकी कीमत चुकानी पड़ी बिहार को। उसकी भरपाई करने आगे आये नीतीश जी मे एक साफ स्वच्छ और सुलझे हुए नेता ने बिहार को कुछ कदम आगे ले जाने में सहायक सिद्ध हुए। लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के चलते हुए महागठबंधन ने बिहार की जनता के मन मे एक बार फिर संशय पैदा किया जिसकी वजह से नीतीश जी को पिछले चुनाव से कम सीट मिली।

जो बचपन से बाहर रहकर पढ़ लिख लिए औऱ बड़े संस्थानों में पढ़ने के बाद उनकी एक अलग विचारधारा बन जाती है जिसको पूरे संसार मे नकारा जा चुका है। और उन्हें जब अपनी जमीन खिसकती नजर आती है तो कभी कॉग्रेस के साथ कभी क्षेत्रीय पार्टियों से मिलकर अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए तथा इन पढ़े लिखे लोगो का सहारा लेकर बड़े बड़े लेख लिखकर लोगो को गुमराह किया जाता है। ये जो साल में एक आध बार गाँव चले जाते है तफरीह के लिए उन्हें क्या पता जो गरीब लालू प्रसाद के शासन के समय बिहार में रहने को मजबूर थे, उन्होंने देखी है शासन की भयावहता। अगर किन्ही को नही मालूम तो वे कृपया मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, पूर्णिया में रहने वाले लोगो से पता करे कि कैसी नारकीय जीवन व्यतीत की है। इन जिले के लोगो से व्यक्तिगत लगाव रहा है इसीलिए बेहतर तरीके से जानता हूँ। तो अगर आपको बुद्धिजीवी होने के नाते लगता है कि लालू प्रसाद जी, नीतीश कुमार जी से बड़े नेता है तो हाँ वे है क्योंकि वाकई में उनका जनाधार नही घटा लेकिन उनकी साख को जो धक्का पहुँचा है उसकी भरपाई होगी या नही आने वाला चुनाव बताएगा। मैं व्यक्तिगत तौर पर किसी का समर्थक नही रहा हूँ लेकिन नीतीश जी ने कुछ ऐसे फैसले लिए, जब बिहारी अपने अस्तित्व की लड़ाई रहे रहे थे तब एक चिराग दिखाई दिया था अंधेरे में। अगर आपको बुद्धिजीवी होने के नाते यह पता नही चारा घोटाला जो उस समय की सबसे बड़ी मानी जा रही थी। उनको भी आप हो सकता है भूल जाये तो क्या अगर कोई यह सवाल करता है कि 32 साल पहले सरकारी निवास में रहने वाला नेता हजारों करोड़ की संपत्ति का मालिक कहाँ से बन गया। तो आप इसको भी राजनैतिक साज़िश कहने में लगे हुए है। तो मुझे तो आपकी पढ़ाई पर शक होता है जो एक भ्रस्टाचारी या एक साफ सुथरी छवि के नेता में अंतर समझ नही पाता है। सनद रहे लालू प्रसाद जी को उच्चतम न्यायालय ने कोई भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया हुआ है। नीतीश कुमार जी की सहयोगियों पर भले ही कई भ्रस्टाचार के आरोप लगे हो लेकिन उनपर व्यक्तिगत तौर पर कोई भ्रस्टाचार का आरोप नही।
बेहतर है थोड़ा पढ़े लिखे होने का परिचय दे ताकि पढ़े लिखे लोग आपको सम्मान की नजर से देखे। आजकल सभी पढ़ लिख रहे है सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे है उन्हें आता है आप जैसे लोगो की प्रोफाइल चेक करना और आपके बारे में अपने मस्तिष्क में आपका चेहरा बना लेते है कि कही आप कोई छुपा हुआ एजेंडा तो थोप नही रहे है। अब वो जमाना नही रहा कि आप जो कहे अक्षरशः सही मान लेंगे वे उनकी पड़ताल करना जानते है कि कब आप ऐसे भ्रस्टाचारियों के पैर छूकर प्रणाम करते है और कब सेना को रेप करने वाला बताते है। और 40 साल की उम्र में ऐसे संस्थानों में मुफ्त की पढ़ाई करने वाले रोजगार को लेकर अचानक से सरकार के खिलाफ बोलने लग जाते है तो सवाल यह भी उठेंगे की जब लालू प्रसाद के समय बिहार में सभी तरह का ह्रास हो रहा था तो आपके मुँह से एक शब्द नही निकलता था। तो जनाब यह आज का दौर है जहाँ सबकुछ एक क्लिक पर उपलब्ध है तो थोड़ा संभल के रहिये, संभल के बोलिये, संभल के लिखिए।

जय भारत।
जय प्रजातंत्र।