वास्तविक स्वतंत्रता या क्षद्म आज़ादी


स्वतंत्रता दिवस की सभी को शुभकामना!

आज की दिन 1947 की मध्य रात्रि को जब भारत आज़ाद हुआ था तो कितने बलिदानियों ने भारत की स्वतंत्रता के लिए हुए यज्ञ में अपनी अपनी आहुति दी थी इसका अंदाज़ा हमे नही हो सकता है क्योंकि हम स्वतंत्र भारत मे पैदा हुए बांस की कलम से लिखना शुरू कर आज पार्कर तक पहुंच गए। गिल्ली डंडा खेलते हुए आज कंप्यूटर पर हाई फाई गेम खेल लेते है। हमे आज़ादी और गुलामी में फर्क कहाँ पता। क्योंकि हम आजाद भारत में पैदा हुए ना। तो क्या आज के दिन का हमारे लिए कोई मायने नही रखता है। आज़ादी के 70 सालो बाद भी भले देश ने चांद की उचाईयों को आत्मसात किया हो। भले ही देश ने परमाणु सम्पन्न देश होने का गौरव हासिल किया हो। भले ही देश आज पूरे दुनिया मे कंप्यूटर के बेहतरीन दिमागों को एक्सपोर्ट करता हो। भले ही हमे संविधान ने बोलने की आज़ादी दी हुई हो लेकिन उस बोलने की आज़ादी में शब्दों को सूंघने का प्रयास बारंबार नही होता है, और लेकिन क्या हम उस बोलने की आज़ादी का दुरुपयोग करते हुए नज़र नही आते है।

भले ही देश हर पल आगे बढ़ने का दंभ भरता हो। लेकिन वाकई में क्या हमारा देश आजाद है या हम आजाद है?

वैसे तो भारत आज़ाद है लेकिन हमारी आज़ादी तबतक बेमानी है जब तक इस देश का कोई भी बच्चा फुटपाथ पर सोता है। हमारी आज़ादी तबतक बेमानी है जबतक इस देश का एक भी बच्चा ट्रैफिक पर भीख मांगता है। हमारी आज़ादी तबतक बेमानी है जबतक एक भी बुजुर्ग वृद्धाश्रम में रहता है। हमारी आज़ादी तबतक बेमानी है जबतक इस देश का एक भी नागरिक भूखा सोता है। हमारी आज़ादी तबतक बेमानी है जबतक एक भी व्यक्ति खुले में सोता है। हमारी आज़ादी तबतक बेमानी है जबतक इस देश का एक भी बच्चा स्कूल जाने से वंचित रह जाता है।

इसका हल क्या है क्या उपरोक्त सभी चीजों का हल निकालने की ज़िम्मेदारी से छुटकारा दिलाना सरकार का काम है शायद नही। तो क्या हम व्यक्तिगत तौर पर हम किसी भी प्रकार अपने सरकार या समाज की मदद कर सकते है। उसके लिए हमें अपनी अपनी व्यक्तिगत/सामाजिक ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करना पड़ेगा। तभी हम अपने देश को विकासशील से विकसित की तरफ ले जाने में सहायक सिद्ध हो सकते है।

पढ़े लिखे लोगो का समाजवाद या ढोंग


मुझे आश्चर्य होता है जब #प्रतिष्टित कहे जाने जैसे संस्थानों में पढ़े लिखे लोग बड़ी ही सावधानी से गरीब गुरबों की आवाज उठाने के नाम पर लालू यादव जैसे नेता का महिमामंडन करते है। जी हाँ ये वही लोग है जब लालू प्रसाद का बिहार की राजनीति में उदय हुआ तो इनलोगो ने कहा देखो इस व्यक्ति को कोई जानता तक नही था और आज मुख्यमंत्री है। लेकिन कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद बिहार सदन के नेता चुने गए और मुख्यमंत्री बनाये गए। अगर उस समय किसी समुदाय ने इसका विरोध किया तो यही समुदाय था कहते नही थकते थे कि इस आदमी को बोलने तक नही आता है और यह बिहार की मुख्यमंत्री बना बैठा है। इन सबके बावजूद लालू प्रसाद ने अपने अस्तितव को बचाने के लिए पिछड़े वर्ग की राजनीति शुरू की। याद रखिये यह वही दौर था जब बी पी मंडल का मंडल आयोग आया जिसका पूरे देश मे विरोध किया गया। और लालू प्रसाद के उस समय शुरू की गई पिछडो की राजनीति ने जो बिहार में पिछड़ो को आवाज दी और बिहार में एक नई राजनीतिक धुर्वीकरण का प्रादुर्भाव हुआ जिसने बिहार के साथ साथ देश के दो बड़े राज्यो में राजनीति की दिशा ही बदल दी। और यही से शुरू हुआ कहावतों का दौर जिसमे यह कहा जाने लगा कि जब तक रहेगा समोसे में आलू तबतक रहेगा बिहार में लालू। और यह कतई नही भूलना चाहिए कि बिहार में लगातार दो बड़ी विजय क्यों मिली क्योंकि बिहार के पिछड़े जिनके पास आवाज तक नही थी उनको लालू प्रसाद ने आवाज दी और राजनीति में उनके लिए दरवाजे खोल दिये। ध्यान रहे यही से शुरू हुआ लालू प्रसाद का नैतिक पतन जहाँ उन्होंने पिछड़ो की राजनीति के अलावा यादवों और मुस्लिमों की राजनीति शुरू की और दूसरी पिछड़ी जातियाँ जो उनको मसीहा समझ रहे थे, अपने आप को ठगा हुआ समझने लगे थे। यही से निरंकुशता शासन की तरफ से इस कदर बढ़ गयी जहाँ सिर्फ जाती देखकर सारे काम होने लग गए। सड़को का खस्ताहाल शुरू हो गया। शिक्षा में नैतिक पतन शुरू हुआ क्योंकि शिक्षकों को समय पर वेतन नही मिलने से वे ठगा सा महसूस करने लग गए थे। सबसे बुरा दौर तब शुरू हुआ जब मौत और अपहरण का तथाकथित उद्योग शुरू हुआ जिसने बिहार को सबसे ज्यादा बदनाम किया। और बाहर रहने वाले बिहारियों को बिहारी गाली लगना शुरू हुआ। सबसे बड़ा टैग तो पटना उच्च न्यायालय ने जंगल राज कह कर कोई कसर नही छोड़ी। पढ़े लिखे लोगो का पलायन जो तब शुरू हुआ जो बदस्तर आज भी जारी है। और उनलोगों ने तब यह कहना शुरू कर दिया था कि अब बिहार रहने लायक नही रहा और वे जब तब अपने आप को बिहारी कहने से अलग रखने लगे। यही नीतीश कुमार का प्रादुर्भाव हुआ, और जो दूसरी पिछड़ी जातियाँ लालू प्रसाद से अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे थे, नीतीश कुमार जी मे नई आशा की किरण की झलक दिखाई दी। जिसका फल यह हुआ कि नीतीश कुमार जी को नई आशा के साथ प्रदेश की बागडोर दी और पहले दो बार चुनाव जीतकर लोगो के भरोसे को कायम रखकर जिस तरह का जिन्न लगा होता था बिहारियों के सिर पर नीतीश जी ने उसको बहुत हद तक धोने का काम किया।

वाकई में लालू प्रसाद जी ने गरीब गुरबों को आवाज दी लेकिन उसकी कीमत चुकानी पड़ी बिहार को। उसकी भरपाई करने आगे आये नीतीश जी मे एक साफ स्वच्छ और सुलझे हुए नेता ने बिहार को कुछ कदम आगे ले जाने में सहायक सिद्ध हुए। लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के चलते हुए महागठबंधन ने बिहार की जनता के मन मे एक बार फिर संशय पैदा किया जिसकी वजह से नीतीश जी को पिछले चुनाव से कम सीट मिली।

जो बचपन से बाहर रहकर पढ़ लिख लिए औऱ बड़े संस्थानों में पढ़ने के बाद उनकी एक अलग विचारधारा बन जाती है जिसको पूरे संसार मे नकारा जा चुका है। और उन्हें जब अपनी जमीन खिसकती नजर आती है तो कभी कॉग्रेस के साथ कभी क्षेत्रीय पार्टियों से मिलकर अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए तथा इन पढ़े लिखे लोगो का सहारा लेकर बड़े बड़े लेख लिखकर लोगो को गुमराह किया जाता है। ये जो साल में एक आध बार गाँव चले जाते है तफरीह के लिए उन्हें क्या पता जो गरीब लालू प्रसाद के शासन के समय बिहार में रहने को मजबूर थे, उन्होंने देखी है शासन की भयावहता। अगर किन्ही को नही मालूम तो वे कृपया मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, पूर्णिया में रहने वाले लोगो से पता करे कि कैसी नारकीय जीवन व्यतीत की है। इन जिले के लोगो से व्यक्तिगत लगाव रहा है इसीलिए बेहतर तरीके से जानता हूँ। तो अगर आपको बुद्धिजीवी होने के नाते लगता है कि लालू प्रसाद जी, नीतीश कुमार जी से बड़े नेता है तो हाँ वे है क्योंकि वाकई में उनका जनाधार नही घटा लेकिन उनकी साख को जो धक्का पहुँचा है उसकी भरपाई होगी या नही आने वाला चुनाव बताएगा। मैं व्यक्तिगत तौर पर किसी का समर्थक नही रहा हूँ लेकिन नीतीश जी ने कुछ ऐसे फैसले लिए, जब बिहारी अपने अस्तित्व की लड़ाई रहे रहे थे तब एक चिराग दिखाई दिया था अंधेरे में। अगर आपको बुद्धिजीवी होने के नाते यह पता नही चारा घोटाला जो उस समय की सबसे बड़ी मानी जा रही थी। उनको भी आप हो सकता है भूल जाये तो क्या अगर कोई यह सवाल करता है कि 32 साल पहले सरकारी निवास में रहने वाला नेता हजारों करोड़ की संपत्ति का मालिक कहाँ से बन गया। तो आप इसको भी राजनैतिक साज़िश कहने में लगे हुए है। तो मुझे तो आपकी पढ़ाई पर शक होता है जो एक भ्रस्टाचारी या एक साफ सुथरी छवि के नेता में अंतर समझ नही पाता है। सनद रहे लालू प्रसाद जी को उच्चतम न्यायालय ने कोई भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया हुआ है। नीतीश कुमार जी की सहयोगियों पर भले ही कई भ्रस्टाचार के आरोप लगे हो लेकिन उनपर व्यक्तिगत तौर पर कोई भ्रस्टाचार का आरोप नही।
बेहतर है थोड़ा पढ़े लिखे होने का परिचय दे ताकि पढ़े लिखे लोग आपको सम्मान की नजर से देखे। आजकल सभी पढ़ लिख रहे है सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे है उन्हें आता है आप जैसे लोगो की प्रोफाइल चेक करना और आपके बारे में अपने मस्तिष्क में आपका चेहरा बना लेते है कि कही आप कोई छुपा हुआ एजेंडा तो थोप नही रहे है। अब वो जमाना नही रहा कि आप जो कहे अक्षरशः सही मान लेंगे वे उनकी पड़ताल करना जानते है कि कब आप ऐसे भ्रस्टाचारियों के पैर छूकर प्रणाम करते है और कब सेना को रेप करने वाला बताते है। और 40 साल की उम्र में ऐसे संस्थानों में मुफ्त की पढ़ाई करने वाले रोजगार को लेकर अचानक से सरकार के खिलाफ बोलने लग जाते है तो सवाल यह भी उठेंगे की जब लालू प्रसाद के समय बिहार में सभी तरह का ह्रास हो रहा था तो आपके मुँह से एक शब्द नही निकलता था। तो जनाब यह आज का दौर है जहाँ सबकुछ एक क्लिक पर उपलब्ध है तो थोड़ा संभल के रहिये, संभल के बोलिये, संभल के लिखिए।

जय भारत।
जय प्रजातंत्र।

​सुकमा में हुए नक्सली घटना में शहीद हुए हमारे सैनिको को श्रद्धांजलि। 


सुकमा में हुए नक्सली घटना में शहीद हुए हमारे सैनिको को श्रद्धांजलि। 

ऐसा लगता यह सरकार सिर्फ कड़ी निंदा के लिए जानी जाएगी और वह किसी भी तरह की निंदा की बात की करेगी जैसे कठोर निंदा, घोर निंदा या कड़ी निंदा। पहले भी ऐसा होता रहा है। पहले की सरकारें भी ऐसी ही कड़ी निंदा करती रही है। अगर सरकार चाहे तो कुछ भी हो सकता है, क्योंकि नक्सली बहुल इलाकों में केंद्र और राज्य सरकारें अगर तालमेल बिठाकर चले तो ऐसी घटनाएं कभी हो ही नहीं। लेकिन ऐसा लगता है राज्य सरकारों की भी अपनी मजबूरियाँ है जिसके चलते वे भी कोई कड़ा कदम नही उठाते है और किसी को ठेस ना पहुंचे उसके बाद यह कहना चाहूँगा की वे ऐसा चाहते है कि होते रहे और उनकी दुकानें चलती रहे। सरकारें आती जाती है लेकिन ऐसा लगता है की सरकारी कुर्सी में ही कुछ ऐसा है जिससे वहाँ पर बैठने वालों का चरित्र वैसा ही हो जाता है जैसा एक निवर्तमान मुख्यमंत्री जी ने कहा था कि इस कुर्सी में ही कुछ ऐसा है जिसपर बैठते ही लोग एक ही तरीके से व्यवहार करने लग जाते है।

सही कहा था किसी ने, सरकारें आती जाती रहेंगी लेकिन यह मुल्क मेरे बाद भी रहेगा और मेरे कई पुस्तों के बाद भी रहना चाहिए। आइए सब मिलकर आवाज उठाएं की अब सरकारों को आम जनता की भावनाओं से खिलवाड़ ना करके उनकी भावनाओं के साथ न्याय करना चाहिए। हम गूंगी बहरी सरकार को जगा सकते है। हमे अपनी आवाज उन तक पहुंचानी है ताकि सरकारी तंत्र में बैठे लोग यह समझे कि हमारी भावनाएं क्या है और हम क्या चाहते है। हम एक एक कर मारे जा रहे है और हम इंतज़ार कर रहे ही कि कोई ऐसी घटना हो जिससे सारा संसार हमारी काबिलियत पर उंगली उठाने लग जाये। 

उठो जागो और बता दो हम क्या चाहते है और ऐसे हैवानियत के पुजारियों को जो खाद पानी शहरों में बैठकर दे रहे है उन्हें भी हमारी आवाज सुननी होगी कि वे सिर्फ एकतरफ़ा बाते नही कर सकते है। वे सिर्फ यहां पर एसी कमरों में बैठकर गरीबों के हितों की बात ना करे। हमने गरीबी देखी है और अगर वाकई में देखनी है तो चले हमारे साथ हम दिखाएंगे की गरीबी क्या होती है। फिर देखते है किस तरह के गरीबों के हितों की बात करते है। ब्रांडेड कुर्ता, जीन्स और चप्पलें पहनने वाले गरीबो के हितों की बात करते है। खोखली मानसिकता के पुजारी ये सिर्फ हल्ला कर सकते है और कुछ नही।

धन्यवाद। 

जयहिन्द, जय भारत।

नोट: यह पोस्ट राजनीति से प्रेरित नही इसीलिए अगर किन्ही को राजनीतिक कमेंट करना है तो वे ना करे।

Why you should think Long-term when investing in Equities?


When it comes to investing for your future, there are a lot of stocks and investment to choose from. Although there is no specified formula or handbook that investors are expected to follow, there is one general rule: “Invest for the long-term and buy in dips”. Don’t bother about the Market position whether it is all time high or all time low.

If you need funds for the short term, investing in stocks is not encouraged as by the markets leaders because of the nature of volatility of market and can swing in either direction based on a lot of factors. That is why, in India, gold and real estate are preferred investment options. However, if you’re looking to your returns 5 or more years into the future, an investment in equities or an equity fund can be ideal.

Here are reasons why long term planning is essential when investing in equities:
1. Power of compounding
Your age and financial responsibility play an important part in your investment decisions. Since youngsters have fewer financial responsibilities such as retired parents, a spouse, children, or car or home loans to pay off, they are encouraged to start their investments early. A young individual also has a high risk-bearing capacity, being able to withstand the swings of the market. Moreover, buying stocks or investing in equity for the long term allows you to take advantage of compounding.

Compounding requires two factors for it to work: the reinvestment of earnings, and time. The more time you give your investments, the more you can accelerate the income potential of your original income.

For example, an investment of 10,000 at 10% will result in 11,000 in one year. If you decide to reinvest the gain of 1,000 and receive the same rate of return, your capital will grow to 12,100 by the end of the second year. By contrast, not reinvesting the gains would have resulted in capital of just 12,000. This difference seems small over short time periods, but if one were to sustain the same 10% annual rate of return over a decade, the difference would show 25,937 for the reinvested corpus, versus just 20,000 total for the portfolio with gains pulled out of the market.

Year Starting Value Multiplier Interest Earned End Value
1 10,000 10% 1,000 11,000
2 11,000 10% 1,100 12,100
3 12,100 10% 1,210 13,310
4 13,310 10% 1,331 14,641
5 14,641 10% 1,464 16,105
6 16,105 10% 1,610 17,715
7 17,715 10% 1,771 19,487
8 19,487 10% 1,948 21,435
9 21,435 10% 2,143 23,579
10 23,579 10% 2,357 25,937

The above table is for illustrative purposes only.

2. The data doesn’t lie
Although there have been ups and down, history shows that if you align your portfolio for the long term, you’re more likely to make money, especially if you focus on high-quality businesses.

After the 2008 crisis, many investors terminated their SIPs. This was a really bad choice because the whole point of an SIP is to keep investing, irrespective of market conditions. Investments made when the markets are down big tend to make the greatest profits – as Warren Buffett says, “Be greedy when others are fearful.”

3. You can correct investment mistakes in the long term
Anyone can start a long-term investment; you don’t have to be an investment guru to invest in well-run businesses for the long term. An important thing to remember is that you will make mistakes; even the best investors have been wrong. But a regular review of investments every six months can help to correct at least some of these mistakes. It is important to hold on to companies that have historically demonstrated strong growth and add to companies whose business models are still intact but have fallen on hard times.

भारतीय नोटों का विमुद्रिकरण


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Indian Rupee Symbol

मुझे बड़ा आश्चर्य होता है जब हमारे सोशल मीडिया के बुद्धिजीवी कह रहे है कि 500 और 1000 के नोट पर बैन से लोगो को तकलीफ हो रही है। तो मैं आपको सही करने की कोशिश करता हूँ क्योंकि यहाँ पर आप तकनिकी तौर पर कतई सही नहीं है क्योंकि 500 और 1000 के नोट बैन नहीं हुए है सरकार आपसे कह रही है कि आप इसको नए नोट के साथ बदले। इसको अर्थशास्त्र की भाषा में विमुद्रिकरण कहते है। क्यों बदलना है क्योंकि सरकार को लगता है जो 500 और 1000 के नोटों के रूप में जो नकली नोट मार्किट में हर दिन भेजा जाता है आतंकवादी संगठनों और नशे के व्यापारियों द्वारा अगले कुछ सालों तक उसपर लगाम लगी रहेगी। वैसे भी अम्बेडकर साहेब कह गए की हर दसवें साल हमें अपनी मुद्रा जो सबसे ज्यादा प्रचलन में हो उसे बदल देना चाहिए।

यह नोट को बदलवाने की प्रक्रिया में कुछ समय लग सकता है। कोई कहेंगे की बैंक इसको अपनी तरफ से लगातार इस बात को करके भी कर सकते थे, क्यों अचानक से यह किया गया। अगर बैंक लगातार इस कोशिश को करती शायद मुमकिन है जिनके पास बिना मूल्यांकन वाली आय है उस पैसे को भी बदल दिया जाता।

यह कोई आज लिया गया फैसला नहीं कह सकते है बातो में तह पर जाने की कोशिश करे फिर पता चलेगा कि बात कहाँ से शुरू होकर यहाँ तक पहुंची है।

१) सबसे पहले जन धन योजना लागू कर उनलोगों को अर्थशास्त्र की मुख्य धारा में जोड़ने की कोशिश।

२) उसके बाद सारे सब्सिडी को बैंक अकाउंट और आधार कार्ड के साथ लिंक करना।

३) उसके बाद ITR को पैन के साथ साथ आधार या पासपोर्ट के साथ लिंक करना।

४) उसके बाद का यह कदम साबित करता है सरकार ने इस कदम को उठाने दो साल पहले से तैयारी शुरू कर दी थी।

लेकिन इस विमुद्रिकरण को और सही तरीके से लागू किया जा सकता था। जिसको आप सरकार की गलती के तौर पर देख सकते है। जो मेरे ख्याल से निम्न उपाय किये जा सकते थे:

१) 1 महीने पहले से ATM में 100 के नोट डालने थे 500 और 1000 के नोट को कम करते जाना था दिन ब दिन।

२) RBI को 1000 और 500 के नोट वापस लेते रहने चाहिए थे ताकि मार्किट में 1000 और 500 का नोटों का व्यवहार कम होता जाता।

३) RBI को 100 के नोट का सही व्यवहार में आने का इंतज़ार करते रहना चाहिए था। हो सके तो और 100 के नोटों को छापकर मार्किट में डालते रहना चाहिए था ताकि 500 और 1000 के नोट के वापस लेते रहने से मार्किट में पैसे की कमी से निपटा जा सकता था।

४) 1 महीने पहले से ATM का अपग्रेड शुरू कर देना चाहिए था।

धन्यवाद।